आपा धापी

एक पप्पी, एक झप्पी, 


एक चुम्मा, एक पारी, 


दो वक़्त की रोटी, 


और कठिनाइयों से जूझती नारी, 


कुछ अपमान कुछ सम्मान 


दूर कहीं अब तक कुछ नहीं बदला,


छुक-छुक, रुक-रुक, ची-ची, पों-पों, 


कोस कोस चलना, 


चल चल कर कोसना, 


भीतर की आवाज़ कोई सुन नहीं पाता 


और क्यों बाहर शोर इतना है ज्यादा, 


झूठ को आँच नहीं 


सच चोट है पहुँचाता,


एक चुटकी सिंदूर में सारा जीवन भर जाता है,


लाल रंग हर काम में टांग अड़ाता है,


एक बुराई, एक अच्छाई, कुछ मजबूरी, 


चार बाई चार का बँगला फिर भी कितनी थी दूरी, 


कल तक जिसे कोसते थे वो अब साथ नहीं,


जिसे पकड़ कर रहते थे वो हाथ अब नहीं,


कमाना आदत बना डाली है, 


ज़रूरतें कम कर करके,


ख़ुद से लड़ कर जीत जाती हूँ,


कोई रोकने टोकने वाला नहीं है 


इसलिए आज की नारी कहलाती हूँ!

  

Comments

  1. शायद हर नारी की यही कहानी है।

    ReplyDelete
  2. सफलता के पथ पर आप गतिमान रहे
    स्वर्णिम शिखर आपकी प्रतीक्षा में है।

    अनंत शुभकामनाएं और आशीर्वाद।

    ReplyDelete
  3. आत्मविश्वास में बल प्राप्त हो जाता है आपके अद्भुत शब्दों से! धन्यवाद!

    ReplyDelete
  4. शिखर मन में है... पा लो तो ऊंचाई हम स्वयं तय कर सकते हैं!!

    अच्छा लगा sir

    ReplyDelete
  5. सत्य वचन
    'पारी' शब्द की व्याख्या करिए

    ReplyDelete
  6. दोनों हाथों की उँगलियाँ को जोड़ कर एक साथ अपने मुँह पर रख कर सामने वाले की ओर गेंद की तरह उछाल देना, यानि स्नेह को प्रदर्शित करना। ये पारी है !

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

कृष्ण मुझ से जब पूछेंगे !!

उधार लिया था

ग़लतफ़हमी