Posts

मैं हूँ, वो थी।

वो माँगती रही, मैं देता रहा। वो चुप रही, मैं कहता रहा। वो लौटकर न आने के लिए चली गई, मैं बैठा रहा। उसने मुझसे सब माँगा जो मेरा था, मुझे लगता रहा— रिश्ता जो था हमारा, वो गहरा था। वो चंचल नदी-सी थी, मैं सागर-सा ठहरा हुआ। वो बारिश थी, मैं उसमें भीगता हुआ। वो सुर थी, मैं गीत। वो वीणा थी, मैं उसका संगीत। मैं शाम था, वो खिली हुई-सी धूप। मैं भँवरा था, वो एक फूल। वो बारिश की पहली बूँद थी, मैं ज़मीन की धूल। मैं परिंदा था, वो मेरा आसमान। मैं पहाड़ था, वो गिरता झरना। मैं कलम था, वो मेरी कविता। मैं अक्षर था, वो मेरी कहानी। मैं सूरज था, वो मेरी छाया। मैं चाँद था, वो मेरी चाँदनी। मैं प्यासा था, वो मेरी प्यास। मैं धड़कन था, वो मेरी साँस। मैं बीता हुआ कल था, वो मेरी आस। मैं सर्द रात था, वो मेरी गर्माहट। मैं अंधकार था, वो मेरा उजाला। मैं कृष्ण था, वो मेरी राधा। वो पूर्ण थी— और मैं आधा। मैं हूँ, वो थी।

आँसू बस पानी हैं।

आँसू सब कहना जानते हैं, आँसू सब सहना जानते हैं। आँसू बोलकर भी बहते हैं, आँसू चुप रहकर भी कहते हैं। आँसू कहानी हैं, आँसू यादें हैं, आँसू बातें हैं, आँसू मुलाक़ातें हैं। आँसू बचपन हैं, आँसू जवानी हैं, आँसू बुढ़ापा हैं। आँसू के बाद भी आँसू हैं। आँसू दोस्ती के होने की निशानी हैं, आँसू दोस्त के न होने की कहानी हैं। आँसू बिछड़ना हैं, आँसू मिलना हैं। आँसू जन्म हैं, आँसू मृत्यु हैं। आँसू हैं तो बात बाक़ी है, आँसू हैं तो जज़्बात बाक़ी हैं। आँसू जीत जाना हैं, आँसू हार मानना हैं। आँसू शिक्षा हैं, आँसू अज्ञानता हैं। आँसू लड़ाई हैं, आँसू समझाना हैं। आँसू बाँटना हैं, आँसू मिलाना हैं। आँसू रूठ जाना हैं, आँसू ग़ुस्सा हैं। आँसू माँ हैं, आँसू बच्चा हैं, आँसू पिता हैं, आँसू बेटी हैं। आँसू थाली में खाना हैं, आँसू खाली थाली हैं। आँसू आँख हैं। आँसू बह जाएँ तो सुख है, आँसू रुक जाएँ तो दुःख है। आँसू बस पानी हैं।

मर्द

 मर्द को दर्द नहीं होता,  मर्द रोता नहीं है।  मर्द कुछ कहता नहीं है,  मर्द सब कुछ सहता है।  मर्द घर की ढाल है,  मर्द तारीख़ों में बदलता साल है।  मर्द आसमान है,  मर्द ज़मीन है।  मर्द रोटी है,  मर्द घर का राशन है।  मर्द है तो घर में सुशासन है।  मर्द आँख का काजल है,  मर्द है तो माँ का आँचल है।  मर्द बारिश में भीगना है,  मर्द बारिश में छाता है।  मर्द धूप में छाँव है,  मर्द ठंड में चादर है।  मर्द गर्मियों की हवा है।  मर्द जीवन की साँस है,  मर्द जीने की आस है।  मर्द है तो शिक्षा है,  मर्द है तो थाली है  मर्द है तो दीवाली है।  मर्द किस्सा है  मर्द कहानी है  मर्द बचपन है  मर्द बुढ़ापा है  मर्द नोक झोंक है  मर्द लड़ाई है  मर्द मनाना है  मर्द मान जाना है  मर्द गुस्सा है  मर्द प्यार है  मर्द अँधेरा है  मर्द उजाला है  मर्द है तो त्यौहार है  मर्द है तो सबका व्यवहार है।  मर्द है तो इज़्ज़त है,  मर्द है तो ताक़त...

कुछ बातें बोलकर समझ नहीं आतीं !!

कोना सब खा जाता है रोना सब बहा ले जाता है हँसना सब छुपा जाता है कहना सबको नहीं आता है सुन हर कोई नहीं पाता है आँख सब देख नहीं पाती है नज़र से कोई नहीं बच पाता है दिल कब पिघलता है और कब पत्थर हो जाता है ज़ुबान कभी भी लड़खड़ा सकती है दाँत कभी भी तोड़े जा सकते हैं हड्डियाँ जल्दी जुड़ जाती हैं दिल जोड़कर भी जोड़े नहीं जाते हैं मुहब्बत बेवफ़ा ही कहलाती है प्रेम अंधा ही रह जाता है आत्मा छोड़ जाती है और शरीर जल जाता है कोई अपना धोखा दे जाता है और एक सपना सच भी हो जाता है लोग मिलते हैं, पर मिल नहीं पाते हैं लोग अलग होते हैं, पर हो नहीं पाते दिन बदलते हैं, फिर लोग भी बदल जाते हैं किसी को छोड़ना आसान हो जाता है जब वो पलटकर जवाब दे जाता है बातें ख़त्म नहीं होतीं जब दोस्ती गहरी होती है काम बुरा नहीं लगता जब पसंद का होता है कुछ बातें बोलकर समझ नहीं आतीं और कुछ बातें पढ़कर समझ आ जाती हैं

कृष्ण मुझ से जब पूछेंगे !!

कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि क्या कमाया मैं बोलूंगा "मित्रता" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि क्या गवाया मैं बोलूंगा "शत्रुता" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि साथ क्या लाये हो मैं बोलूंगा "कुछ नहीं" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि क्या छोड़ आये हो मैं बोलूंगा "सब कुछ" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि तेरा क्या था मैं बोलूंगा "अहंकार" "क्रोध" "काम" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि मेरा क्या था मैं बोलूंगा "प्रेम" "समर्पण" "त्याग" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि अपना कौन था मैं बोलूंगा "कोई नहीं, काया भी नहीं" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि पराया कौन था मैं बोलूंगा "अपमान" "घृणा" "तिरस्कार" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि किसको पाला मैं बोलूंगा "ईर्ष्या" "क्रोध" "लोभ" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि जीवन अंत कैसा हो मैं बोलूंगा "भय मुक्त" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि कैसे पाओगे मैं बोलूंगा "अपेक्षा के त्याग से" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि क्या करना चाह...

आंसू नहीं जानते हैं !!

गालों पर फैलते काजल की कीमत  आंसू नहीं जानते हैं !! लहरों से डरने वाले समंदर नहीं लांघते हैं !! काग़ज़ के शेर अक्सर बारिशों में बाहर नहीं आते हैं  वक़्त पड़ने पर खून के रिश्ते जम जाते हैं  किताबों की पढ़ी बातें बस परीक्षा में लिख कर आते हैं  और असल ज़िन्दगी में जीने के फ़लसफ़े बदल जाते हैं  कोशिश करने से हार बुरी नहीं लगती  जो जीत जाते हैं वो ये बात समझाते हैं  जिनको आँखें मूँद कर देख लिए करते थे  अब वो आँख खोल कर भी नज़र नहीं आते हैं  बात तेरे मेरे की कभी थी ही नहीं  बस कुछ लोग बिना बोले लकीर खींच जाते हैं  उड़ तो लूँ पर आसमाँ छोटा पड़ने लगा है  बादलों में घर बनाया था   पर हवाओं ने सब इधर उधर कर दीया है  कोई चुटकी काट कर बता दो यारों  दिल पर किसने कब्ज़ा कर लिया है  छीन कर लाये थे उनको गैरों से  अब गैरों ने ही हमें चलता कर दीया है  कोई रोक लो पानी को, ज़मीन प्यासी है  सूरज ने भी बादलों पर पहरा कर दीया है  अरे आते जाते लोग ताना मारने लगे थे  हमने भी किसी किसी के लिए खुद को बहरा कर दीया है...

कांधा झुका नहीं है मेरा!

कांधा झुका नहीं है मेरा, बस वो दोस्त, अब दोस्त नहीं रहा मेरा।  कोशिश हजार की मनाने की, पर उसने थान रखी थी चले जाने की।  अच्छा हुआ उसने मुड़ कर नहीं देखा मैं आंसुओं को रोक नहीं पाता।   चल कर इतनी दूर आए थे भला ये भी कोई उम्र हुई छोड़ जाने की।   दरवाजा मैंने निकाल रख छोड़ा है, अब जरूरत नहीं पड़ेगी खटखटाने की।  खंजर अब नहीं बचे हैं घर में मेरे, तुम्हें जरूरत नहीं है घबराने के।  आईना भी तोड़ रखा है, क्या ही पड़ी है अब इतराने की।  आहिस्ता बोल कर समझाना बेमानी था, क्या ज़रूरत थी चीख कर निकल जाने की।  पड़ोसी अब अक्सर पूछ लेते हैं कि क्यों आवाजें कम आती है हमारे घर से।   मैं मुस्कुराता हूँ ये बोलकर, ज़रूरत नहीं पड़ती अब खुद को मनाने की 🙂