मैं हूँ, वो थी।

वो माँगती रही,

मैं देता रहा।

वो चुप रही,

मैं कहता रहा।


वो लौटकर न आने के लिए चली गई,

मैं बैठा रहा।


उसने मुझसे सब माँगा जो मेरा था,

मुझे लगता रहा—

रिश्ता जो था हमारा, वो गहरा था।


वो चंचल नदी-सी थी,

मैं सागर-सा ठहरा हुआ।

वो बारिश थी,

मैं उसमें भीगता हुआ।


वो सुर थी,

मैं गीत।

वो वीणा थी,

मैं उसका संगीत।


मैं शाम था,

वो खिली हुई-सी धूप।

मैं भँवरा था,

वो एक फूल।


वो बारिश की पहली बूँद थी,

मैं ज़मीन की धूल।

मैं परिंदा था,

वो मेरा आसमान।


मैं पहाड़ था,

वो गिरता झरना।

मैं कलम था,

वो मेरी कविता।


मैं अक्षर था,

वो मेरी कहानी।

मैं सूरज था,

वो मेरी छाया।


मैं चाँद था,

वो मेरी चाँदनी।

मैं प्यासा था,

वो मेरी प्यास।


मैं धड़कन था,

वो मेरी साँस।

मैं बीता हुआ कल था,

वो मेरी आस।


मैं सर्द रात था,

वो मेरी गर्माहट।

मैं अंधकार था,

वो मेरा उजाला।


मैं कृष्ण था,

वो मेरी राधा।

वो पूर्ण थी—

और मैं आधा।


मैं हूँ,

वो थी।

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