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Showing posts from July, 2022

तरक्की कि परिभाषा

तरक्की कि परिभाषा,  थोड़ी उम्मीद थोड़ी आशा,  बड़े से सपने बुनो,  सही दोस्त चुनो,  कोशिश हर बार करो,  दुश्मनी से अच्छा दुश्मन को माफ़ करो,  ग़लती ख़ुद की ना माफ करो,  कोई और करे थोड़ा इंसाफ करो,  आधी हिम्मत भी काम आती है,  दुआ सच्चे दिल की क़बूल की जाती है, छोटे रास्ते ही बड़ी मंज़िलों पर है ले जाते,  आत्मविश्वास के सामने ही लोग हैं सर झुकाते,  एक कदम एक कदम चलने से  हज़ारों मील के रास्ते भी है कम पड़ जाते, दुःख सबको है मिलता, पर जीतते वही हैं  जो अपने लक्ष्य से नज़र नहीं हटाते। 

कोशिश

सपने शहर देख कर नहीं लिए जाते,  उम्मीदों का दामन सड़कों से नहीं पकड़ा जाता,  प्यार शक्ल देख कर ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाता,  बारिश तुझे तेरे शहर में कम या ज्यादा नहीं भिगोती,  तेरे शहर में आसमान ज्यादा नीला नहीं नज़र आता,  आंसुओं में नमक तेरे शहर में भी उतना ही होता है,  दिल किसी का भी हो, जब भी दुखी होता है उतना ही रोता है, मोहब्बत चीजों से नहीं ज़िंदा से की जानी चाहिए है, इज़्ज़त पीठ पीछे की जाये तो सच्ची मानी जानी चाहिए,  नजदीकियां पास रहने से नहीं,  साँसों की गर्मी से महसूस की जाती है,  क्यूंकि दिल को नहीं पता चलता कि  आँखें ख़ुशी हो  या ग़म अक्सर क्यों भीग जातीं हैं, मंज़िल चाहे कितनी भी दूर हो रास्तों से डरना नहीं चाहिए, हाथों की लकीरें चाहे कितनी भी छोटी हों,  मेहनत की कलम से बड़ी कर देना चाहिए, सपने जागते हुए भी देखे जाते हैं,  जो शीर्ष पर पहुंचे है,  उदाहरण उन्हीं के दिए जातें हैं।

ज़िंदगी

सफ़ेद रंग थोड़े ना होता है,  आँखों को बिना काले रंग के सुन्दर कौन कहता है,  नीला आसमान सिर्फ़ ज़मीन से नज़र आता है, पानी रंग और आकार कभी भी बदल पाता है, पक्षिओं का घर घोंसला कहलाता है, किसी के ना होने का ग़म ज़ुबान से बयाँ नहीं हो पाता है,  और किसी के मिल जाने की ख़ुशी दिल आंसुओं से आँखों को भिगो कर बताता है, कोई सिर्फ़ मतलब के लिए प्यार करे वो जीते जी दूसरों की नज़रों में मर जाता है, और कोई बेवजह मदद करे तो वो फ़रिश्तों सा बन जाता है, माँ बाप की जगह अक्सर कोई नहीं ले पाता है, ग़लतफ़हमी हो तो भाई-भाई का दुश्मन हो जाता है, जो वक्त पड़ने पर अपनों का साथ छोड़ दे, उन्हें वक्त एक ना एक दिन आईना ज़रूर दिखलाता है, और जब एक दिन चले ही जाना है फिर ना जाने क्यूँ  इंसान इतनी दौलत और कई मकान बनाता है। आपस में प्यार हो तो एक छोटे से  आशियाने में  इंसान ख़ुशियों का संसार बसा पाता है।  कहने को वक़्त वक़्त होता है पर  इंसान अपनी सोच से उसे अच्छा या बुरा बनाता है। पेट की भूख एक रोटी से भी बुझती है,  और पैसो...

मदर सा

सुशेंद्र कुमार चट्टोपाध्याय आजीवन अमरीका में रहे। अब उम्र का दौर बाकी सब दौरों को पीछे छोड़ गया था, और बच्चे अपनी अपनी ज़िन्दगी में बिज़ी हो गए थे तो उनका मन मानुष माटी के लिए पीड़ित हो गया और चले आये वापस अपने देश। अब जब आ ही गए थे पुश्तैनी मकान में जहाँ कभी इन्हीं तंग गलियों में घोडा गाड़ी चला करती थी अब सरपट ई-रिक्शा चलते हैं, गलियां वही पुरानी थी जान पहचान वाले इक्का दुक्का कोई बचा होगा। तो घूम घूम कर गलियां देख रहे थे।  आज जाने क्यों चटो जी सवेरे से ही खुश दिखलाई पड़ रहे थे मानो अभी-अभी कॉलेज पास किए हों। शायद आज़ादी का एहसास हुआ होगा, शायद क्या हुआ ही होगा। अब मतलब ना पूछिए जनाब, आपको आईडिया भी नहीं होगा कि कितनी सख़्ती है विदेशों में। अब यहाँ कितना आराम है कहीं भी हल्का हो लो, जब मन चाहा थूक लो या मन न भी करे तो भी थूकते रहो। मैं तो कहता हूँ कि थूकने का राष्ट्रीय स्तर पर खेल करवाया जाना चाहिए। थूको प्रतियोगिता।  अनिवेज़ आगे बढ़ते हैं, नहीं तो आप लोग आगे बढ़ जाएंगे। तो चटो बाबू घूमने निकल पड़े बाज़ार की ओर, वक़्त दोपहर का रहा होगा, चटो बाबू को कुछ भूख सी लगने लगी तो उन्होंने पहली गोश्...

बेटा और माँ

बेटे को लोग जब चिढ़ाते हैं तो माँ पल्लू से चेहरा पोंछ कर कहती है  तू किसी हीरो से कम है क्या, राजकुमारी ही मिलेगी तुझे,  क्लास में लड़ाई हो जाए तो, स्कूल ही गन्दा है,  प्यार में फेल हो जाता है, तो लड़की पसंद ही नहीं थी मुझे,  पापा डांटें तो, पापा को समझ नहीं है,  बाइक पंक्चर हो जाये तो, बेटा कार ले ले थक जाता होगा,  रोटी थोड़ी सी सूख जाए, हाँ बेटा आटा ही ख़राब आया है  अगली बार ख़ुद पिसवा कर लाऊँगी,  माँ भूख नहीं है, माँ दौड़ कर नज़र लग गई है मेरे बच्चे को,  सुनो जाकर जूस ले आइये मुझे भी पीना है, माँ थकती नहीं है,  बेटा भीग कर आता है, माँ बारिश को कोसने लगती है "मेरे बेटे को भिगो दिया थोड़ी देर से नहीं आ सकती थी क्या", लेकिन जब बेटे की लाश घर आये तो माँ क्या बोले किसे दोष दे,  सरकार को  या  आतंक को ।   ख़ुदा को या भगवान को।  मौलवियों को या पंडितों को।  या फिर  सत्ता के गलियारों में घूमती ज़िंदा लाशों को, तू फ़ौज में था या सड़क पर,  तू अलग था या शामिल,  तूने कोई किताब भी नहीं पड़ी,  तूने तिलक या टोप...

मिलने की ख़ुशी

कोई मिला कोई छूट गया,  कुछ बना कुछ टूट गया,  कुछ अपने पराये हो गए,  कुछ पराये अपने हो गए,  कुछ सच सपने रह गए,  और कई सपने सच हो गए,  कुछ को सालों लग गए बनाने में, कुछ ने सिर्फ एक पल  लिया  जाने में, कुछ दर्द दे गए, कुछ खुशियां बाँट गए,  सफ़र में कई मिले और मिलते रहेंगे,  कई आते, कई जाते रहेंगे,  कुछ सीख जाएंगे, कई सीखा जाएंगे, कई मुखौटे है, कुछ तो उम्मीदों से भी छोटे हैं, लम्बी तो रातें भी होती हैं, ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, मुड़ कर देखो तो खोने का ग़म नहीं  मिलने की ख़ुशी रहनी चाहिए।

रेड लाइट

जैसे ही ड्राइवर ने इग्निशन के गले में चाभी डाल कर जो घुमाई, हमें फैजुद्दिन चचा की याद आ गई, बस यूँ कहिये की आँख बंद कर लीजिये और उन्हें हाज़िर खड़ा पाइये। चाभी वो ऐसे घुमा रहा था जैसे फैजुद्दिन चचा खाँस रहे हों और चाची मुँह दबा रहीं हों की बहु जाग न जाए।  कम से कम ७ या ८ बारी गला दबाने यानि की चाभी घुमाने के बाद जो झमझमा के बस चालू हुई तो एक बार को लगा कि खड़ा हो कर सिटी ही बजा दूँ,  फिर ज़हन में ख़याल आया की मेरठ नहीं मुंबई है।   तो साहब मुंबई से नाशिक का सफर चालू हो गया। पहले १५ मिनट तो ऐसे गुज़र गए के पता ही नहीं चला। फिर आ गई लालमुँहि  रेड लाइट। अब रेड लाइट आते ही अपने लल्लन की आँखों में चमक आ गई, किस्सा थोड़ा पुराना है पर बता ही देते हैं, आप कहाँ भागे जा रहे हैं, परसो की ही बात ले ली जिए, लल्लन के मुँहबोले चच्या ससुर की मौसी के पोते के मामा की बहिन के देवर के एकलौते सपूत जो अभी अभी कक्षा ३ में आएं हैं पूछ बैठे, फूफाजी ये रेड लाइट एरिया क्या होता है। अब रेड लाइट एरिया सुनते ही समझदार लोगों के कानों में घंटियां  बजने लगती हैं, और भोली जनता को केवल लाल बत्ती ही ...

रिश्ते

रिश्तों में शर्मिंदगी महसूस हो तो निभाना नहीं चाहिए,  भीतर से ना पसंद हो तो मुस्कुराना नहीं चाहिए,  कुछ बुरा लगे तो माफ़ करना आना चाहिए,  कुछ अच्छा लगे तो बताना चाहिए, जो ग़म यादों के सहारे दर्द दें उन्हें भुलाना चाहिए,  जो यादें आंसुओं के सहारे ख़ुशी दें उन्हें बहाना चाहिए,  रिश्तों में शर्मिंदगी महसूस हो तो निभाना नहीं चाहिए, जो आँखें बंद करके भी दिखें उन्हें भुलाना चाहिए, जिससे प्यार हो उस पर हक़ जताना चाहिए, कभी झगड़ पड़ो तो पहले सर झुकाना चाहिए, दिन में एक बार खुल कर ज़रूर मुस्कुराना चाहिए. अपनों को दूसरों के और दूसरों को अपनों के क़िस्से सुनाना चाहिए, कोई रोता मिले उसे हँसाना चाहिए, कोई भटक गया हो तो सही राह दिखाना चाहिए, मुश्किलों से निकलना आना चाहिए, जो बीत गया उसे दोहराना नहीं चाहिए, रूठों को मनाना आना चाहिए,  कमज़ोर को साथ बैठाना चाहिए,  जो डरे उसे हिम्मत सिखाना चाहिए, जो तुम्हें आता हो वो दूसरों को बताना चाहिए,  हक़ के लिए लड़ना आना चाहिए, ग़लत काम के लिए ना कहना आना चाहिए, बातों में कड़वाहट नहीं लाना चाहिए, कितना भी दु...

मैं

संगीत दिखाई क्यों नहीं देता प्यार अँधा क्यों कहलाता है तेरे आने पर धड़कन क्यों बढ़ जाती है और तेरे जाने से दिल क्यों बेचैन हो जाता है आँखों में पानी कहां से आता है लबों पे मुस्कान कौन सजाता है ख़्वाहिशें बड़ी और चाहत छोटी क्यों होती है रातों को जागना किसे कहते हैं सोच की लगाम कहां मिलती है एहसास छूने को ही कहते हैं?  प्यास सिर्फ़ पानी की ही होती है? सपने रंगीन क्यों नहीं होते जब भी दर्द होता है तो अपने नज़दीक क्यों नहीं होते सच कड़वा क्यों होता है झूठ के पाओं क्यों नहीं होते ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ क्यों नहीं होती आदमी सिंदूर क्यों नहीं लगाते क्यों माँ बाप छोटे में बच्चों को और बच्चे जवानी में माँ बाप को हैं छोड़ जाते मेरे में "मैं" है, तो तेरे में "मैं" क्यों नहीं छोटी सी बात है मगर  सब लोग क्यों नहीं समझ पाते।

शोर

वैसे मुंबई बेस्ट बस की तारीफ सुनते सुनते काफी वक़्त गुज़र गया था, किन्तु कभी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था सफर करने का, सफर यानि सफर हाँ अंग्रेज़ी वाला सफर,  किन्तु आज सुबह इच्छाओं के विपरीत अवांछित मन से मैंने और  मेरे एक मित्र ने अपने कर कमलों से लाल कलर की  ६ चक्रिका वाहन में पदार्पण कर ही दिया।  फिर क्या था मेरे लिए तो मानो ईस्ट मैन कलर वाली फिल्म चलने लग गई,  कट टु मैंने और मेरे मित्र ने बिना परिश्रम एक सीट प्राप्त भी कर ली, बस ने चार बांग्ला मार्केट से खार वेस्ट की ओर उड़ान भरी,  जब बस गतिमान हुई तब हमें पहली बार इस बात का  आभास या अनुभव हुआ की ध्वनि जब विकराल रूप लेती है तब क्या होता है,  बंधुओं कुछ भी कहना असंभव है क्यूंकि वो आप केवल अनुभव कर सकते है.  तो हुआ यूँ की बस की प्रत्येक खिड़की इतना शोर कर रही थी कि मानो स्कूल बस में, बच्चे छुट्टियों पर जा रहे हों.  इतना शोर था की जब हमने कंडक्टर को बोला दो खार देना  और शोर के कारण उनको सुनाई दिया हमको उतार देना, बस जुहू सर्किल पर ही रोक दी गई, जैसे ही बस रुक...

मिट्टी के खिलौने

सपनों का घर है, मिट्टी के खिलौने,  खेलने वाले हाथों में उम्मीद के कन्धों का भार है, आंसू थमते नहीं, खुशियाँ बस उधार हैं,  अपनी ख्वाहिशों के गुब्बारे बेच रहे हैं,   सोते जागते बेघर, घर का सपना देख रहे हैं, आसमान कम पड़ जाता है, जब उम्मीद टूट जाती है,  माँ के दिलासे की हंडिया भी पकते पकते फूट जाती है, पिता के ख़ाली हाथों में, शाम की रोटी जब नज़र नहीं आती है,  फिर पिता की कहानियाँ ख़त्म होने का नाम नहीं लेती, भूक तो लगती है पर हँसते-हँसते पेट में दर्द हो जाता है, माँ पानी से पेट भर लेती है, और पिता पेट पर रुमाल कस कर बांध के सो जाता है, मुन्नी का दूध बस अभी आता है!,   यही दिलासा काफी वक़्त से दिया जाता है, रोते रोते सोने की आदत भी अब पुरानी है, किसी के लिए ये सच्चाई है,  किसी के लिए सिर्फ कहानी है, मिट्टी   के दियों से रोशन हर दरो दीवार है, रोशनी सब और है पर चिराग़ों के नीचे अँधेरा बरक़रार है, सपनों का घर है, मिट्टी के खिलौने.

संघर्ष

जब भी अपवाद हुए, विवाद बने,  विवादों से संघर्ष उत्पन्न हुए,  संघर्षों से उत्पन्न हुआ अस्तित्व का प्रश्न,  प्रश्नों का उत्तर खोजते सीमाएँ लांघी गईं, सीमाएँ लांघने से मान सम्मान का हनन हुआ,  सम्मान हनन से अपमान का बोध हुआ,  अपमान बोध होते ही सेनाओं का निर्माण हुआ,  सेनाओं के निर्माण से  जन्म  हुआ  कुंठित राजाओं  का,  कुंठित राजाओं से जन्म हुआ युद्धों का,  युद्ध  से  प्रारम्भ हुआ  समाज के  विनाश का,   विनाश से उत्पन्न हुई जीने की प्रबल इच्छा,  जीने की आवश्यकता से सृजन हुआ आविष्कार का, आविष्कार से पुनः जन्म हुआ अपवाद का,  अपवादों से विवाद बने, जो मान लिया गया वो लुप्त हो गया,  जो विवादों में रहा, जीवित रहा।

इश्तिहार

इज़हार-ए-मोहब्बत अब इश्तिहारों सी मालूम होती है,  सी से गए लबों के पीछे गुम सवालों सी मालूम होती है,  नज़रों से शिकायत कर भी दें,  पर ज़ेहन में ज़ंजीरों सी मालूम होती है,    सभी तो ग़मज़दा हैं और भी शोर थमता नहीं,  बोलें भी तो क्या, मौज़ों के किनारे कोई सुनता भी नहीं,  सब को मालूम हो मोहब्बत अब कितांबो में ही पढ़ने पाते हैं,  और कितांबो को भी पड़े ज़माने गुज़र जाते हैं,  जनाज़ों में शामिल जैसे दिखलाई पड़ने लगे हैं लोग,  शायर को भी महफ़िल में अब कम बुलाते हैं,  इज़हार-ए-मोहब्बत अब इश्तिहारों सी मालूम होती है।   कोई सुफेद काग़ज़ छोड़ गया था दरवाज़े पे मेरे,   सोचा क्यों न स्याह कर दूँ। ......!!!

टूटी हुई साइकिल

टूटी हुई साइकिल, बिखरे हुए सपने,  बारिश में भीगती काग़ज़ की नाव से..... छोटे छोटे बुनते सपने,  एक सोच बादलों में खोई सी,  एक उम्मीद ऊपर वाले से आधी जागी आधी सोई सी, जिसको देखो सर झुकाए चला जा रहा है,   मंज़िल आ भी गई तो उँगलियों का इशारा कहीं और बतला रहा है,   एक एक कर सारी सीढ़ियाँ ख़त्म हो गईं,  फिर भी आशाओं की एक और नई सीढ़ी बना रहा है,  इंसान कहाँ जा रहा है,  सोच कर देखो देख कर सोचो,   आँधियों में जहाँ दीपक नहीं बुझने पाते वहीं, सूरज पर हसीन चन्द्रमा ग्रहण लगा रहा है,  कुछ आये कुछ चले गए, जिनको जाना था वो हैं ,  जिनको रहना था वो गुज़र गए,   गुज़र गईं वो सर्द रातें,   गुज़र गए लम्हा दो लम्हा की गईं बातें,  सब पानी की तरह हाथों की उँगलियों के बीच से गुज़र जायेगा,  जो एहसास भी है पानी का वो वक़्त की हवाओं के साथ सूख जायेगा,  अपने लिए वक़्त निकाला करो,  बंद दरवाज़ों के पीछे अँधेरे कमरों में उजाला करो, टूटी हुई साइकिल, बिखरे हुए  सपने  

अधूरा सा

कुछ अधूरा वाला पूरा बाक़ी है, आँसू अभी पलकों से टपका भी नहीं,  गालों पर पूरी हँसी आधी बाक़ी है, बाक़ी हैं कुछ शिकायतें,  जो सुना वो अधूरा सा अब भी बाक़ी है,  वो दोनों पलकों  का  बिछड़ना  पूरा  बाक़ी है,  वो लबों का ख़ुद से टकराना आधा बाक़ी है,  दांतो तले जीभ का सरकना पूरा बाक़ी है,   बाक़ी है तेरा बाँहों में भींच कर मुझे पूरा आगोश में ले लेना,   बाक़ी है अधूरा अधूरा सा ज़िंदा रहना,  आधी रात पूरी बाक़ी है,   दिन पूरा आधा बाक़ी है,  तू है पर तू है नहीं, ये ख़याल अधूरा सा पूरा बाक़ी है,  कुछ अधूरा वाला पूरा बाक़ी है ।

मौन

विवश हूँ मौन हूँ ,  जल रहा अग्नि में,  मैं कौन हूँ,   न धर्म का पता,  न कर्म का,  बह रहा जल में,  मैं कौन हूँ, ईश्वर न आत्मा,  दोनों के होने से न होने के मध्य में,  घुट रहा मैं, मैं कौन हूँ,  चीखें कानों से हृदय को भेद रहीं हैं,  मर्यादा की सारी सीमाएं भीड़ तोड़ रही है।  सुन कर बहरा हुआ जा रहा हूँ मैं,  मैं कौन हूँ, आबरू लुटती जा रही है,  माँओं की गोद लाशों से भरती जा रही है,  धरती लहू के रंग से लाल है,  मनुष्य ही मनुष्य का बन रहा काल है,  पर मैं क्या करूँ मैं कौन हूँ, राख के ढेर में घरों के होने की तलाश है,  ये हिन्दू का घर, वो मुस्लिम का  था ,  पर जो शख़्स जल रहा है, वो सिर्फ एक लाश है,  न उसका कोई धर्म है न कोई ज़ात है,    आवाज़ें चारों ओर से आतीं हैं,  भीड़ में अपना कौन है?, ये बात हर पल सताती है,   कब तक धर्म युद्ध चलेगा, कौन जाने कल किसके घर का दीपक जलेगा, इस सब के बीच.....   मैं कौन हूँ, मैं विवश हूँ, मैं मौन हूँ .!!!  मुनि: स्वर!

आपा धापी

एक पप्पी, एक झप्पी,  एक चुम्मा, एक पारी,  दो वक़्त की रोटी,  और कठिनाइयों से जूझती नारी,  कुछ अपमान कुछ सम्मान  दूर कहीं अब तक कुछ नहीं बदला, छुक-छुक, रुक-रुक, ची-ची, पों-पों,  कोस कोस चलना,  चल चल कर कोसना,  भीतर की आवाज़ कोई सुन नहीं पाता  और क्यों बाहर शोर इतना है ज्यादा,  झूठ को आँच नहीं  सच चोट है पहुँचाता, एक चुटकी सिंदूर में सारा जीवन भर जाता है, लाल रंग हर काम में टांग अड़ाता है, एक बुराई, एक अच्छाई, कुछ मजबूरी,  चार बाई चार का बँगला फिर भी कितनी थी दूरी,  कल तक जिसे कोसते थे वो अब साथ नहीं, जिसे पकड़ कर रहते थे वो हाथ अब नहीं, कमाना आदत बना डाली है,  ज़रूरतें कम कर करके, ख़ुद से लड़ कर जीत जाती हूँ, कोई रोकने टोकने वाला नहीं है  इसलिए आज की नारी कहलाती हूँ!   

सूचना

कोई अपना अधूरा सपना छोड़ गया है,  मैं मुंबई सेंट्रल स्टेशन के प्लेटफोर्म 3 पर बैठा अँधेरी लोकल का इंतज़ार कर रहा हूँ।  कोई अपना अधूरा सपना छोड़ गया है, 2 चप्पल उनमें से एक टूटी हुई, और एक डोरी से बंधी हुई है.  एक चश्मा प्लास्टिक टेप से जिसका सिरा चिपकाया हुआ है।  एक थैला जिसमें से कुछ काग़ज़ बाहेर झाँक रहे हैं, वो गवाही दे रहे हों मानो की सपना मरा नहीं है, बस अधूरा है। कुछ दवाई के पत्ते पड़े हैं शायद दमा या खांसी के रहे होंगे। एक पुरानी अटैची, जिसको खोल कर एक पुलिस वाला कुछ ढूंढ रहा है और दूसरा पुलिस वाला फ़ोन पर जाने किस्से बात कर रहा है, कुछ किताबें भी पड़ी दिख रहीं हैं। "आज का खलनायक और नायक कौन" शीर्षक है, और थोड़ी दूर एक खाने का डब्बा बिखरा हुआ है, 3 सूखी रोटी 2 प्याज और थोड़ा सा आम का अचार जो बिखर गया था। माँ या बहन ने बना कर दिया होगा। क्यूंकि सपना देखना कोई अपराध थोड़े न है। एक माँ जानती है की बेटे का सपना सच होता है, और एक बहन भी मानती है की  एक भाई का सपना पूरा होता है।   और थोड़ी ही दूर एक गहरी नीली पैंट और सिंपल सफ़ेद चेक में एक लड़का...