टूटी हुई साइकिल
टूटी हुई साइकिल, बिखरे हुए सपने,
बारिश में भीगती काग़ज़ की नाव से..... छोटे छोटे बुनते सपने,
एक सोच बादलों में खोई सी,
एक उम्मीद ऊपर वाले से आधी जागी आधी सोई सी,
जिसको देखो सर झुकाए चला जा रहा है,
मंज़िल आ भी गई तो उँगलियों का इशारा कहीं और बतला रहा है,
एक एक कर सारी सीढ़ियाँ ख़त्म हो गईं,
फिर भी आशाओं की एक और नई सीढ़ी बना रहा है,
इंसान कहाँ जा रहा है,
सोच कर देखो देख कर सोचो,
आँधियों में जहाँ दीपक नहीं बुझने पाते वहीं,
सूरज पर हसीन चन्द्रमा ग्रहण लगा रहा है,
कुछ आये कुछ चले गए,
जिनको जाना था वो हैं ,
जिनको रहना था वो गुज़र गए,
गुज़र गईं वो सर्द रातें,
गुज़र गए लम्हा दो लम्हा की गईं बातें,
सब पानी की तरह हाथों की उँगलियों के बीच से गुज़र जायेगा,
जो एहसास भी है पानी का वो वक़्त की हवाओं के साथ सूख जायेगा,
अपने लिए वक़्त निकाला करो,
बंद दरवाज़ों के पीछे अँधेरे कमरों में उजाला करो,
टूटी हुई साइकिल, बिखरे हुए सपने
अधूरे किस्सों में ही तो जिंदगी पूरी होती है... कहीं सजती, कहीं तपती, कही बिखरी सी मिलती है...
ReplyDeleteगौर से देखा है आपने जीवन के रंगों को, गुजरते लम्हों, ना थमती राहों को...
बेहद खूबसूरत!!
आपको अच्छा लगा ये जान कर ख़ुशी हुई !
Deleteधन्यवाद श्रीमान !
ReplyDeleteBahot Khoob
ReplyDeleteBeautifully written
ReplyDeleteThank you !!!
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