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Showing posts from August, 2022

कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे

कुछ सुलझे  कुछ अनसुलझे,  कहीं सोच में फंसे, कभी सोच से निकले, यादों के पिटारे हमेशा बगल में रहते, छांट छांट कर किस्से कहते, कभी आँखें नम करते,  कभी गीले गालों वाली हसी का दम भरते, सांसों पर भी काबू कहां नहीं रहता, ख्वाबों से सारा दामन हमेशा भरा रहता,  कभी एक मुस्कान आने में सालों लग जाते,  और किसी को भुलाने में सदियाँ, कभी हाथी जैसी मस्त चाल,  कभी चीते से भी तेज ख्याल, लोग आते रहे पर गया कोई नहीं,  यादों के पिटारे से बचा कोई नहीं, रात रात भर बातें करना, कोई आहट हो तो डरना, हर एक आहट पर उनके आने की ख़ुशी करना फिर न आने पर मायूसी सा चेहरा करना, यादों ने बड़ा रुलाया है,  पर हसी से भी किसी एक याद ने चेहरे को सजाया है, बचपन लौट कर न आएगा,  जो बीत गया बस वो किस्सा या कहानी रह जायेगा, न जाने कब सीखेंगे न जाने कब जीना आएगा।  

शुक्ला जी की पार्टी

शुक्ला जी की पार्टी ख़तम होते होते पों और पाओं दोनो फटने को थे,  पहली पहर का नगर कीर्तन भी हलका हलका सुनाई पढ़ने लगा था,  और मुँआ राम पखारे बिना घड़ी देखे हुए आज भी समय पर अपना दूध देने के लिए घंटी पर घंटी बजा रहा था। अरे आप भी क्या. .. हसने लगे हैं, अरे भाई राम पखारे दूध नहीं देता है, उसकी बकरियाँ दूध देती है,! बकरियां क्यों ??, अरे भाई साहब गायों का तो लफड़ा चल रहा है ना,  आप तो जानते ही हैं, अब कल ही की बात है, हम यानी के अर्जुन कमल कुमार सिसोदिया और हमारे चार मित्र!!, अब फिर आप सोचने लगे हैं, हाँ भाई साहब आप से सहमत हूँ, मित्र तीन ही होते हैं पर एक आता जाता रहता है,  इसलिए चार कह दिया, अरे ये तो इंसेप्शन सिनेमा जैसा हो गया,  सपने में सपना और फिर एक छोटी सपनी।  बहरहाल सपनी तोड़ कर सपने में चलते हैं, यानी के इससे पहले वाले किस्से पर, यानी के कल ही की बात है वाले पर, हम चार दोस्त काणिये की दुकान पर चाय का ऑर्डर देकर बैठे ही थे कि काणिये के अब्बू… पंडित दीना नाथ सहाय जैसे दिखने वाले अकबरुद्दीन खुरैशी जी ने अपना बकाया मांग लिया।  अब बताइये स...