कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे

कुछ सुलझे  कुछ अनसुलझे, 

कहीं सोच में फंसे, कभी सोच से निकले,

यादों के पिटारे हमेशा बगल में रहते,

छांट छांट कर किस्से कहते,

कभी आँखें नम करते, 

कभी गीले गालों वाली हसी का दम भरते,

सांसों पर भी काबू कहां नहीं रहता,

ख्वाबों से सारा दामन हमेशा भरा रहता, 

कभी एक मुस्कान आने में सालों लग जाते, 

और किसी को भुलाने में सदियाँ,

कभी हाथी जैसी मस्त चाल, 

कभी चीते से भी तेज ख्याल,

लोग आते रहे पर गया कोई नहीं, 

यादों के पिटारे से बचा कोई नहीं,

रात रात भर बातें करना, कोई आहट हो तो डरना,

हर एक आहट पर उनके आने की ख़ुशी करना

फिर न आने पर मायूसी सा चेहरा करना,

यादों ने बड़ा रुलाया है, 

पर हसी से भी किसी एक याद ने चेहरे को सजाया है,

बचपन लौट कर न आएगा, 

जो बीत गया बस वो किस्सा या कहानी रह जायेगा,

न जाने कब सीखेंगे न जाने कब जीना आएगा।  

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

कृष्ण मुझ से जब पूछेंगे !!

उधार लिया था

ग़लतफ़हमी