शुक्ला जी की पार्टी
शुक्ला जी की पार्टी ख़तम होते होते पों और पाओं दोनो फटने को थे, पहली पहर का नगर कीर्तन भी हलका हलका सुनाई पढ़ने लगा था, और मुँआ राम पखारे बिना घड़ी देखे हुए आज भी समय पर अपना दूध देने के लिए घंटी पर घंटी बजा रहा था। अरे आप भी क्या. .. हसने लगे हैं, अरे भाई राम पखारे दूध नहीं देता है, उसकी बकरियाँ दूध देती है,! बकरियां क्यों ??, अरे भाई साहब गायों का तो लफड़ा चल रहा है ना,
आप तो जानते ही हैं, अब कल ही की बात है, हम यानी के अर्जुन कमल कुमार सिसोदिया और हमारे चार मित्र!!, अब फिर आप सोचने लगे हैं, हाँ भाई साहब आप से सहमत हूँ, मित्र तीन ही होते हैं पर एक आता जाता रहता है, इसलिए चार कह दिया, अरे ये तो इंसेप्शन सिनेमा जैसा हो गया, सपने में सपना और फिर एक छोटी सपनी।
बहरहाल सपनी तोड़ कर सपने में चलते हैं, यानी के इससे पहले वाले किस्से पर, यानी के कल ही की बात है वाले पर, हम चार दोस्त काणिये की दुकान पर चाय का ऑर्डर देकर बैठे ही थे कि काणिये के अब्बू… पंडित दीना नाथ सहाय जैसे दिखने वाले अकबरुद्दीन खुरैशी जी ने अपना बकाया मांग लिया।
अब बताइये साहब सुबह सुबह इंसान अखबार पढ़ने आता है चाय की दुकान पर या पैसे बांटने, हद हो चुकी है ऐसा लगता है कि कानपुर से तो मानो इंसानियत गरीब रथ पकड़ कर कोलकाता चली गई हो,
एनीवेस, हमने भी मूंछों को ताव देकर नीचे किया और शेर जैसी दहाड़ करने वाली आवाज को बिल्ली मौसी में भी चार चूहे मिला कर मासूम सा बना कर बोला, "चाचा आपके ही बच्चे हैं कहां मरे जा रहे हैं आपकी चाय पी कर, सारा कर्ज़ा आने वाली मीठी ईद से पहले वाले आने वाले शुक्रवार को यदि पैसे आएंगे तो चूका देंगे। अब अकबरुद्दीन खुरैशी साहब रहे पुराने ख्यालात के, उन्होंने भी गुलजारी लाल नंदा की तरह भैंगा सा लुक दिया और बिना मुस्कुराए चिढ़ चिड़े से बन कर बोलने ही वाले थे कि वहां दूर से गुजरावालां चली आती नज़र आ गईं,
अरे! वही जो सविता भाभी जैसी दिख़ा करती थी भरी जवानी में, हाँ अब बात अलग है, वक़्त बदल गया, हालात बदल गए, और दोनों गोड़ों के आपरीशन भी हो चले थे, अब कहीं जा कर सविता भाभी, ज़ोहरा सहगल की क्लास मैट सी दिखने लगीं थीं, और अपने खुरैशी साहब पिछले 55 सालों से की गंदी नज़रें गड़ाए हैं सविता जी पर आई मीन ज़ोहरा जी की क्लास मैट पर, अब साला इश्क़ भी बुखार की तरह होता है न उम्र देखता है ना औक़ात।
बस वो उनका वहां मुस्कुराना हुआ और यहाँ अकबरुद्दीन जी का कक्षा 5 के मासूम बच्चे की तरह दाँतों तले उंगली दबाना और चचा भूल बैठे ज़ालिम ज़माना, अब किस कम्बख्त को है चाय की टपरी पर कमाना। अरे अरे आप कहाँ बहके जा रहे हैं, मियाँ मुआम्ला उनका पर्सनल है जनाब, और वैसे भी चचा हमारा कर्ज भूल चुकें थे।
बाई दा वे, बड़ी मुश्किल से हिंदी पढ़ते पढ़ते "एक्सक्यूज़ मी" बोलने वालों, पृथ्वी थिएटर पर बैठ कर हिंदी साहित्य की किताब साथ रख कर, मिल्क शेक्स और नाशपाती फल की चर्चा करने वालों हमें बहलाओं ना।
तो साहेब और मेमसाहेब हुआ यूं की सलमान के मुरीद यानि के अमित नेगी, जिसको गाय की अंग्रेजी की स्पेलिंग भी नहीं पता थी, खुद 4 बार कक्षा 3 और 2 बार कक्षा 5 में फेल हो चुकें हैं; बैठे बैठे न जाने क्या सूझा ज़ोर से बोल दिए हमको, कि तू तो मेरी गाय है, बस फिर क्या था सांड जैसे शरीर वाले कैसे बगिया के फूल बनते हैं, ये जान लिया हमने उस दिन।
ऑरेंज रंग के टी शर्ट पहने 2 लोग, लकड़ियों जैसे मुश्टण्डे बगल से गुज़र रहे थे, उन्होंने सुन लिया की तू तो मेरी गायें है, बस काफी था के-जी-ऍफ़ पार्ट 14 के लिए!, एक फ़ोन वो भी हमसे मांग कर, कर दिया गया और फिर चार गणेश भर के दूधियों जैसे दिखने वाले 20 लोग आये और जो सलमान ख़ान जी के फैन हुआ करते थे बहुत पिटे। इतना मारा की बटोरने में आधा घंटे से ज्यादा लग गया आपके भाई को।सूजन इतनी थी की लगता था की मधुमक्खी का छत्ता ये ही हैं।
बोलने की कोशिश कर रहे थे, हमने कहा म्यूट पिक्चर बने रहो नहीं तो कहीं भी ढाई सो ग्राम का बाट रख दिए न सरीर पर तो हिमालय से नागा बाबा उतर आएंगे सुन कर इतनी आवाज़ें निकलेंगी हर एक रोम छिद्र से। जिन्दा हो बस, शुकर मनाओ आज बस की हड़ताल है नहीं तो बी-एच-यू से इतने लौंडे आते की झाड़ू से बटोरना पड़ता।
और कानपुर देहात तो आप जानते ही हो, डॉक्टर के साथ साथ पुलिस भी डरती है छात्र नेताओं से, तो अब हम बिना रिपोर्ट के स्कूल में जमा करा आएंगे, जहां पहले कभी कारखाना चला करता था बाबूजी वही चौकीदार हुआ करते थे करीब करीब 50 बरस के पहले की बात है, वो तो गुज़र चुके हैं, फिर मयखाना खुल गया था, पहले कारखाना रहा फिर मयखाना हो गया और अब स्कूल हो गया है, क्योंकि प्रधानमंत्री ग्राम विद्यालय योजना के तहत खाना मुफ्त है, तो सारा गाँव दोपहर का खाना यही खाता है। नर्स दीदी भी कभी कभी जब भी ड्यूटी करने आती है वो भी खाना वहीं खाती हैं, और हाँ प्रधानाचार्य जी के घर ताड़ी पहुंच जाती है नियमानुसार।
ओह 1 बजने को हैं सब स्कूल पहुंच गए होंगे अगर पंगत में जगह न मिली तो, अमित जो मार खाया है उसको उसी से काम चलाना होगा, और हम उसे भूखा मरते देख नहीं सकते। चलता हूँ बाद में बात करेंगे दवा भी लेनी है और दारू भी, चखना किस्से मंगवायें ये चिंता खाए जा रही है, तुम शुक्ला और चाची को बोलना शाम में आता हूँ, कुमार सानू का गाना सुनेंगे।
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