बेटा और माँ

बेटे को लोग जब चिढ़ाते हैं तो माँ पल्लू से चेहरा पोंछ कर कहती है 

तू किसी हीरो से कम है क्या, राजकुमारी ही मिलेगी तुझे, 

क्लास में लड़ाई हो जाए तो, स्कूल ही गन्दा है, 

प्यार में फेल हो जाता है, तो लड़की पसंद ही नहीं थी मुझे, 

पापा डांटें तो, पापा को समझ नहीं है, 

बाइक पंक्चर हो जाये तो, बेटा कार ले ले थक जाता होगा, 

रोटी थोड़ी सी सूख जाए, हाँ बेटा आटा ही ख़राब आया है 

अगली बार ख़ुद पिसवा कर लाऊँगी, 

माँ भूख नहीं है, माँ दौड़ कर नज़र लग गई है मेरे बच्चे को, 

सुनो जाकर जूस ले आइये मुझे भी पीना है,

माँ थकती नहीं है, 

बेटा भीग कर आता है, माँ बारिश को कोसने लगती है "मेरे बेटे को भिगो दिया थोड़ी देर से नहीं आ सकती थी क्या",

लेकिन जब बेटे की लाश घर आये तो माँ क्या बोले किसे दोष दे, 

सरकार को या आतंक को 

ख़ुदा को या भगवान को। 

मौलवियों को या पंडितों को। 

या फिर सत्ता के गलियारों में घूमती ज़िंदा लाशों को,

तू फ़ौज में था या सड़क पर, 

तू अलग था या शामिल, 

तूने कोई किताब भी नहीं पड़ी, 

तूने तिलक या टोपी भी नहीं लगाई, 

तू तो घर से कह कर निकला था माँ,  

माँ अभी आता हूँ, फिर तेरी लाश क्यों आई।

बेटा किताब नहीं होता क्यूंकि माँ मज़हब नहीं होती। 

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