इश्तिहार

इज़हार-ए-मोहब्बत अब इश्तिहारों सी मालूम होती है, 

सी से गए लबों के पीछे गुम सवालों सी मालूम होती है, 

नज़रों से शिकायत कर भी दें, 

पर ज़ेहन में ज़ंजीरों सी मालूम होती है,   

सभी तो ग़मज़दा हैं और भी शोर थमता नहीं, 

बोलें भी तो क्या, मौज़ों के किनारे कोई सुनता भी नहीं, 

सब को मालूम हो मोहब्बत अब कितांबो में ही पढ़ने पाते हैं, 

और कितांबो को भी पड़े ज़माने गुज़र जाते हैं, 

जनाज़ों में शामिल जैसे दिखलाई पड़ने लगे हैं लोग, 

शायर को भी महफ़िल में अब कम बुलाते हैं, 

इज़हार-ए-मोहब्बत अब इश्तिहारों सी मालूम होती है।  

कोई सुफेद काग़ज़ छोड़ गया था दरवाज़े पे मेरे,  

सोचा क्यों न स्याह कर दूँ। ......!!!

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