मिट्टी के खिलौने
सपनों का घर है, मिट्टी के खिलौने,
खेलने वाले हाथों में उम्मीद के कन्धों का भार है,
आंसू थमते नहीं, खुशियाँ बस उधार हैं,
अपनी ख्वाहिशों के गुब्बारे बेच रहे हैं,
सोते जागते बेघर, घर का सपना देख रहे हैं,
आसमान कम पड़ जाता है, जब उम्मीद टूट जाती है,
माँ के दिलासे की हंडिया भी पकते पकते फूट जाती है,
पिता के ख़ाली हाथों में, शाम की रोटी जब नज़र नहीं आती है,
फिर पिता की कहानियाँ ख़त्म होने का नाम नहीं लेती,
भूक तो लगती है पर हँसते-हँसते पेट में दर्द हो जाता है,
माँ पानी से पेट भर लेती है,
और पिता पेट पर रुमाल कस कर बांध के सो जाता है,
मुन्नी का दूध बस अभी आता है!,
यही दिलासा काफी वक़्त से दिया जाता है,
रोते रोते सोने की आदत भी अब पुरानी है,
किसी के लिए ये सच्चाई है,
किसी के लिए सिर्फ कहानी है,
मिट्टी के दियों से रोशन हर दरो दीवार है,
रोशनी सब और है पर चिराग़ों के नीचे अँधेरा बरक़रार है,
सपनों का घर है, मिट्टी के खिलौने.
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