मर्द

 मर्द को दर्द नहीं होता, 

मर्द रोता नहीं है। 

मर्द कुछ कहता नहीं है, 

मर्द सब कुछ सहता है। 


मर्द घर की ढाल है, 

मर्द तारीख़ों में बदलता साल है। 

मर्द आसमान है, 

मर्द ज़मीन है। 


मर्द रोटी है, 

मर्द घर का राशन है। 

मर्द है तो घर में सुशासन है। 


मर्द आँख का काजल है, 

मर्द है तो माँ का आँचल है। 


मर्द बारिश में भीगना है, 

मर्द बारिश में छाता है। 

मर्द धूप में छाँव है, 

मर्द ठंड में चादर है। 


मर्द गर्मियों की हवा है। 

मर्द जीवन की साँस है, 

मर्द जीने की आस है। 


मर्द है तो शिक्षा है, 

मर्द है तो थाली है 

मर्द है तो दीवाली है। 


मर्द किस्सा है 

मर्द कहानी है 

मर्द बचपन है 

मर्द बुढ़ापा है 


मर्द नोक झोंक है 

मर्द लड़ाई है 

मर्द मनाना है 

मर्द मान जाना है 


मर्द गुस्सा है 

मर्द प्यार है 


मर्द अँधेरा है 

मर्द उजाला है 


मर्द है तो त्यौहार है 

मर्द है तो सबका व्यवहार है। 


मर्द है तो इज़्ज़त है, 

मर्द है तो ताक़त है, 

मर्द है तो ख़ुशी है, 

मर्द है तो घर चलता है, 

मर्द है तो सब चलता है। 


मर्द घर का किवाड़ है, 

मर्द घर की कुण्डी है 

मर्द है तो आँगन है। 


मर्द है तो आज है, 

मर्द है तो कल है, 

मर्द है तो जीवन का बल है। 

मर्द ही घर चलाता है, 

मर्द है तो सब संभल जाता है। 


मैं गंगूबाई, मीराबाई खोपकर, 

मैं अपने घर की मर्द हूँ।

Comments

Popular posts from this blog

कृष्ण मुझ से जब पूछेंगे !!

उधार लिया था

ग़लतफ़हमी