कांधा झुका नहीं है मेरा!
कांधा झुका नहीं है मेरा, बस वो दोस्त, अब दोस्त नहीं रहा मेरा।
कोशिश हजार की मनाने की, पर उसने थान रखी थी चले जाने की।
अच्छा हुआ उसने मुड़ कर नहीं देखा मैं आंसुओं को रोक नहीं पाता।
चल कर इतनी दूर आए थे भला ये भी कोई उम्र हुई छोड़ जाने की।
दरवाजा मैंने निकाल रख छोड़ा है, अब जरूरत नहीं पड़ेगी खटखटाने की।
खंजर अब नहीं बचे हैं घर में मेरे, तुम्हें जरूरत नहीं है घबराने के।
आईना भी तोड़ रखा है, क्या ही पड़ी है अब इतराने की।
आहिस्ता बोल कर समझाना बेमानी था, क्या ज़रूरत थी चीख कर निकल जाने की।
पड़ोसी अब अक्सर पूछ लेते हैं कि क्यों आवाजें कम आती है हमारे घर से।
मैं मुस्कुराता हूँ ये बोलकर, ज़रूरत नहीं पड़ती अब खुद को मनाने की 🙂
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