शोर

वैसे मुंबई बेस्ट बस की तारीफ सुनते सुनते काफी वक़्त गुज़र गया था,

किन्तु कभी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था सफर करने का,

सफर यानि सफर हाँ अंग्रेज़ी वाला सफर, 

किन्तु आज सुबह इच्छाओं के विपरीत अवांछित मन से मैंने और 

मेरे एक मित्र ने अपने कर कमलों से लाल कलर की 

६ चक्रिका वाहन में पदार्पण कर ही दिया। 

फिर क्या था मेरे लिए तो मानो ईस्ट मैन कलर वाली फिल्म चलने लग गई, 

कट टु मैंने और मेरे मित्र ने बिना परिश्रम एक सीट प्राप्त भी कर ली,

बस ने चार बांग्ला मार्केट से खार वेस्ट की ओर उड़ान भरी, 

जब बस गतिमान हुई तब हमें पहली बार इस बात का 

आभास या अनुभव हुआ की ध्वनि जब विकराल रूप लेती है तब क्या होता है, 

बंधुओं कुछ भी कहना असंभव है क्यूंकि वो आप केवल अनुभव कर सकते है. 

तो हुआ यूँ की बस की प्रत्येक खिड़की इतना शोर कर रही थी

कि मानो स्कूल बस में, बच्चे छुट्टियों पर जा रहे हों. 

इतना शोर था की जब हमने कंडक्टर को बोला दो खार देना 

और शोर के कारण उनको सुनाई दिया हमको उतार देना,

बस जुहू सर्किल पर ही रोक दी गई, जैसे ही बस रुकी 

तब हमें शांति का आभास हुआ ऐसा जान पड़ता था की 

सब थम गया हो शांत हो गया हो सब शिथिल है सब सौम्य है,  

कितना शोर है दुनिया में और जब सब रुक गया 

तो हमें ये ज्ञात हुआ की कितना शोर है हमारे भीतर भी  

आपके भीतर भी

क्या क्या चल रहा है 

कितना दुःख, कितनी वेदना, 

कितनी शिकायत, कितना क्रोध, 

सब ओर शोर है, सब चीख रहें हैं भीतर

थोड़ा रुक कर सोचना चाहिए 

क्या बंद नहीं कर सकते भीतर का शोर

बहार का शोर कानों पर हाथ रख कर भी रुक जायेगा 

पर भीतर के शोर के लिए आपको प्रयास करने होंगे,

सब जो भीतर कौतुहल है, शोर है, अपेक्षाएँ हैं, आकांक्षाएं हैं, प्रश्न हैं, उत्तर हैं, 

उन सबको चुप करना होगा,

भीतर के शोर को सुनिए, अपने से बात कीजिये।


Comments

  1. Sach mein ham sabhi ko is aatmachintan ki bahut aavashyakta hai.

    ReplyDelete
  2. Shor ko kuchh samay ke liye to rok hi diya apki kavita ne 😊

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

कृष्ण मुझ से जब पूछेंगे !!

उधार लिया था

ग़लतफ़हमी