मौन
विवश हूँ मौन हूँ ,
जल रहा अग्नि में,
मैं कौन हूँ,
न धर्म का पता,
न कर्म का,
बह रहा जल में,
मैं कौन हूँ,
ईश्वर न आत्मा,
दोनों के होने से न होने के मध्य में,
घुट रहा मैं,
मैं कौन हूँ,
चीखें कानों से हृदय को भेद रहीं हैं,
मर्यादा की सारी सीमाएं भीड़ तोड़ रही है।
सुन कर बहरा हुआ जा रहा हूँ मैं,
मैं कौन हूँ,
आबरू लुटती जा रही है,
माँओं की गोद लाशों से भरती जा रही है,
धरती लहू के रंग से लाल है,
मनुष्य ही मनुष्य का बन रहा काल है,
पर मैं क्या करूँ मैं कौन हूँ,
राख के ढेर में घरों के होने की तलाश है,
ये हिन्दू का घर, वो मुस्लिम का था,
पर जो शख़्स जल रहा है, वो सिर्फ एक लाश है,
न उसका कोई धर्म है न कोई ज़ात है,
आवाज़ें चारों ओर से आतीं हैं,
भीड़ में अपना कौन है?, ये बात हर पल सताती है,
कब तक धर्म युद्ध चलेगा,
कौन जाने कल किसके घर का दीपक जलेगा,
इस सब के बीच.....
मैं कौन हूँ,
मैं विवश हूँ, मैं मौन हूँ .!!!
मुनि: स्वर!
शब्दों के माध्यम से आंतरिक वेदना का प्राकट्य मन को अंदर तक झकझोर जाता है।
ReplyDeleteआप की संवेदनशीलता यूं ही बनी रहे।
अनंत शुभकामनाएं और आशीर्वाद
प्रोत्साहन के लिए पुनः धन्यवाद । आप आशीर्वाद देते रहें मैं सार्थक प्रयास करता रहूँगा!
ReplyDeleteइसे पढ़ के तो मैं भी मौन हूं... Very thoughtful!!
ReplyDeleteThank you hai apko!
DeleteSuch a beautiful insight
ReplyDeleteThank you sir!
DeleteNo words to define your excellency
ReplyDeleteThank you for being so kind!
ReplyDeletePowerful Lines Thanks for Sharing
ReplyDelete