ऐंठन

ये ऐंठन लाते कहाँ से हो, 

ये सर उठा कर जाते कहाँ पर हो,  

गोला तो एक है घूम घूम कर आते कहाँ से हो, 

चले थे जहाँ से सर को उठाये,  

सिकंदर हो या अकबर, 

सभी है मिट्टी में दफ़्न,

सर को झुकाये, 

हवाओं का रुख मोड़ नहीं पाते हो, 

पानी को बोतलों में बंद कर क्यों इतना इतराते हो, 

उम्र निकल जाती है नाम कमाने में, 

तुम यूँही शौक के लिए सर पर पाऊँ धरे जाते हो, 

तू तू, मैं मैं, मेरा तेरा, वगैरह वगैरह

ऊंट भी पहाड़ के नीचे आ कर शरमा जाता है,  

तुम्हें क्या बात का गुरूर है, 

क्या आसमान तुम्हारी ड्योढ़ी पर आकर चने खाता है,

गर्दन झुका कर देखो कितनो को तुमने कुचला है। 

तुम्हारी जूती के नीचे कितनो का दम निकला है,

ये ऐंठन लाते कहाँ से हो.

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