चलूँ अकड़ अकड़

चलूँ अकड़ अकड़, 

कभी सिरक सिरक, 

कभी  तड़क भड़क, 

नाचे मन ता थई या, 

ता थई या ता थई या था, 

पानी पी लूँ गुटक गुटक 

नैनों में रखूं चटक मटक, 

खाया कुछ नहीं पर, 

गया सब गटक गटक, 

कुछ काँट छाँट,

कुछ उठा पटक,

कभी लपट झपट,

यूँ ही कभी मटक मटक,

कभी उबल उबल,

कहीं आइस आइस,

कहीं डिफिकल्ट सा मुश्किल 

कहीं नाइस नाइस,

कभी बात बात पर,

कहीं ज़ात पात पर, 

कभी लड़ाई वडाई,

कभी मिलना या मिठाई,

कभी सोच वोच कर,

कहीं नोच खरोंच कर,

कहीं गर्मी में, 

कहीं भीग कर,

कहीं सर्दी में, 

कहीं छींक कर,

कभी हार कर, 

फिर जीत कर,  


ज़िन्दगी रास्ता ढूंढ ही लेती है.

Comments

Popular posts from this blog

कृष्ण मुझ से जब पूछेंगे !!

उधार लिया था

ग़लतफ़हमी