यादों का पिटारा
आज दिल को क्या टटोला, यादों का पिटारा खुल गया,
जो छुपा रखा था जले हुए कागज का किनारा मिल गया,
कुछ अल्फ़ाज़ मिले कुछ बातें, कुछ सूनी, कुछ जागी रातें,
कुछ जागती आंखों के सपने मिले,
कुछ जो पराए हुए वो अपने मिले,
कुछ मिले जो खुशियाँ ले गए,
और कुछ मिले जो आँसू दे गए,
फिर थोड़ा और गहरा खोजा तो बचपन मिला,
जो मां के आंचल में छुपा था,
अटखेलियाँ करता, गिरता पडता, माँ के आँचल में जा छुपा था,
फिर थोड़ी सी जवानी मिली,
बाबूजी की सीखों के साथ कानो को खींचती हुई कहानी मिली,
वो दर्द भी, दांत भी, मुस्कराहट दे गई,
फिर बड़े भाई का वो कमीज मिला जो मैंने स्याह कर रख छोड़ा था,
और बहन का चीख कर मां को बुलाना मिला,
फिर रोते हुए उसके चेहरे पर हसाना मिला,
थोड़ा ही सही खुशियों का खजाना मिला,
और फिर तुम मिली,
एक सुनहरी धूप का एक पल जो था वो सब ओर बिखर गया,
और बिखर गई वो जुल्फ, जो कभी भी काली घटा बन जिंदगी में चली आती थी,
तुम मिलती है तो मुस्कुराहट बिखरती थी,
और न मिलती तो आँखें धुंधली हो जाती थी,
और यादों का पिटारा भर गया,
मैं मैं से हम हुए,
और वक्त मेरा घर हमारा कर गया,
आज दिल को क्या टटोला, यादों का पिटारा खुल गया!
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