फ़िल्मी कीड़ा!

रात बड़ी तकलीफ देह गुज़री, कई करवटों के बदलने के बाद भी नींद का नामो निशाँ नहीं था. अब गोया यूँ की हमने कोई गलती तो की नहीं थी की हमें किसी चीज़ की घबराहट हो. चलो  ये  बात भी आपसे शेयर कर किये देता हूँ, ताकि आप कोई शक या गलत फहमी न रखें और एक साफ़ सुथरी सत्य घटना का आनंद ले सकें। तो साहब हुआ यूँ की शाम 7 बजते - बजते हम अपने पायजामे और बनियान में जा बसे थे और एकांत में खिड़की के सहारे खड़े होकर बाहरी  दुनिया को गालियाँ दे ही रहे थे की इस बीच जब हम एक तरफ हो कर दुनिया से नज़रें चुरा कर एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ हलके हो रहे थे तभी अचानक से हमारा मोबाइल फ़ोन, ढिंका चिका ढिंका चिका की चीखो पुकार करने लग गया। हमने भी माहौल  को गरम करते हुए हु हा हु हा की और गला साफ़ करने वाली आवाज़ का सहारे लेते हुए "हॉलो" का उच्चारण किया और फिर जैसे समय रुक गया। 

अरे भैया मेहबूब स्टूडियो से फ़ोन था। हाँ- हाँ आपकी भी आँखें बड़ी बड़ी खुल गई ना......  तो क्या आसान बात थोरे ही न है की मेहबूब स्टूडियो से किसी को फ़ोन आना। बहरहाल अपने ही गंध से हमारी चेतना टूटी और हम भाग कर हवादार रोशनदान के पास पहुंच गए, और सामने वाले की कर्कश आवाज़ को भी कोयल सी मधुर जान कर , खुद को सम्मान देते हुए हमने कहा गमछा स्पीकिंग हियर और सामने से वही कर्कश सी आवाज़ जैसे अमरीश पूरी का गाला बैठ गया हो, अरे मुन्ना बसेस्वर बोल रहे हैं; मेहबूब स्टूडियो से. 

ढिचकियाओँ (गोली चलने की आवाज़) .. ये कौन बोल रहा है मात्र 3  दशमलव 14 सेकंड में हमने अपने पुरे खानदान का पिक्चर सामने से दौडा दिया पर ये साला बिसेस्वर कौन है।

फिर उसी आवाज़ से हमारा ध्यान भांग हुआ, "अरे मुन्ना हम बोल रहा हूँ, छुट्टन के बहिन लाडो के जीजा के मौसा के फूफा के बहनोई के दामाद का चाचा के लड़का, तुम उस दिन मिले रहे थे ना। ...  छुट्टन के घर और बतिया रहे थे की शूटिंग देखना है, 

तभी मेरे दिमाग और दिल में एक साथ बिजली कौंधी और मुझे चाचा चौधरी की तरह "जिनका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है" याद आ गया। 

अरे. . . !!! आपको याद आया ना ?  ... चाचा चौधरी, साबू, डैमोंड कॉमिक्स .... ? 

सर तो हिलाइए जनाब, मेमसाब!!!  हाँ वही उनकी तरह मुझे तुरंत से आधे घंटे बाद याद आ गया की ये हमारे दोस्त के पड़ोस की एक मैयत में मिले थे और वहीँ बड़ी बड़ी छोड़ रहे थे अब छोड़ रहे थे या सच हाँक रहे थे मालूम नहीं, पर हमें फ़ोन कर के इन्होने ये साबित कर दिया की इंसानियत ने अभी भारत नहीं छोड़ा है और रिश्तेदारी साली एक न एक दिन काम आ ही जाती है। तो हम भी तपाक से बोले अरे चचाआआआ  आप? हम आपकी आवाज़ पहचान ही न पाये। हमें तो लगा अमरीश अंकल ही हमसे बोल रहे हैं। 

हाँ चाचा जी बताइये!

बिसेस्वर चाचा : बेटा कल हमारे यहाँ बहुत बड़े स्टार की शूटिंग है चले आना शूटिंग भी देख लेना और हम स्टार लोगो से मिलवा भी देंगे। हम बोले चाचा कौन स्टार है? "बिंदु दारा सिंंग " बिसेस्वर चाचा ने गर्व के साथ उच्चारण किया। 

लो गई भैंस भैंस पानी में ! हम फिर से दिमाग पर बैल जितना बोझ डाल दिए, लेकिंग याद नहीं पड़ता था की साला ये बिंदु दारा सिंग कौन है, बहरहाल बिंदु हो या क्वेश्चन मार्क या अर्ध विराम। हमें शूटिंग देखने से मतलब था बस।

तो साहब हुआ यूँ कि रात तौ करवट लेते लेते ही  काटनी पडी, और सुबह 6 बजने से और कम्बख्त अखबार वाले के आने से पहले ही नहा धो कर हम रेडी हो लिए। अखबार वाले जिनका नाम उनके स्वरुप से भिन्न है "सुन्दर" ने कचोड़ मरोड़ कर अखबार हमरी बालकनी से अंदर फेंका और हमने भी "अभय कुरुविला" की तरह कैच करने का निरर्थक प्रयास किया। सुन्दर की स्माइल से हीं उनकी भावना का अर्थ प्रकट हो गया जो हमें हीन होने के एहसास के साथ छोड़ ट्रिन ट्रिन की ध्वनि कर आगे चले गया, इतने में हमारी चाय जो जल कर काढ़ा बन गई थी की याद हमें किचन मैं खीच ले गई। जला हुआ पतीला मांजने के भय से हमने पतीले को नलके के नीच रख पानी चला उसे ठंडा किया और आपकी बहु, जो हमारी उत्तेजना को बिना समझे सो रहीं थी, हमने उन्हें किवांड लगा लेने का आदेश देते हुए निकल लिए अँधेरी लोहपतगामिनी पथ की ओर।  

इस बात का हमें पूरा पूरा ज्ञान था की यदि ट्रैन भरी हुई आये तो अपने सामान को अपना शरीर का हिस्सा मान कर किस प्रकार ट्रैन में सवार होना है और गाय जैसा मासूम न रह कर बैल जैसा स्वाभाव का प्रयोग कर दुसरो से खुद रक्षा कर ट्रैन में चढ़ जाना है। पर श्रीमान  आश्चर्य करेंगे की रविवार होने से और प्रातः काल होने के कारण ट्रैन खली आई और हमने स्वयं को एक राजा की भांति सम्मान देते हुए ट्रैन में प्रवेश किया और खिड़की वाली सीट पर जा विराजमान हो गए, वो हमने रजनी सर की कई फिल्में देखीं है तो हमने वैसे ही टांग पर टांग रख कर बैठना उचित समझा। ट्रैन ने अब अँधेरी स्टेशन छोड़ा और पार्ला आते आते मोर नुमा कई प्राणिओं को हमने ट्रैक के सहारे और किनारे बैठा पाया। और फिर अचेतन में से एक चेतना प्रकट हुई और हमें साहित्यकार प्रेम चंद जी के संसार में ले जा कर खड़ा कर दिया। इतना दुःख, इतनी वेदना, इतना दुःख सहने की अपार शक्ति केवल उपन्यास के पात्रों  में होती है या इन लोगों में जो मुर्गी के दड़बो सामान चार दीवारो में रह ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, अधिक व्याख्या करूँगा तो मैं भी एक उपन्यास की सररचना कर बैठूंगा, 

जिसका शीर्षक शायद "एक अधूरा सच " होगा जिसे हम आँखें बंद कर रोज़ देखते हैं और खुद को दिलासा देते हैं की सब ठीक है और हमें तो इश्वेर का आशीर्वाद प्राप्त है। 

ज़रा से भावुक हो गया हूँ और बांद्रा स्टेशन भी आ गया गया है। मैं पानी पि कर पुनः आपसे भेंट करता हूँ। …।

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