महबूब स्टूडियो
रात बड़ी तकलीफ देह गुज़री, कई करवटों के बदलने के बाद भी नींद का नामों निशान नहीं था। गोया हुआ यूँ की हमने कोई गलती तो की नहीं थी कि हमें किसी चीज़ की घबराहट रही हो और ये बात भी आपसे पहले ही बता रहे हैं ताकि आप भी कोई ग़लत मतलब ना निकल लें और एक साफ़ सुथरी घटना के मूक दर्शक बने रह सकें।
तो साहब हुआ यूँ की शाम ८ बजते बजते हम अपने पायजामे और बनियान में जा बसे थे, और एकांत में खिड़की के सहारे बाहरी दुनिया को भरे पेट गालियाँ दे ही रहे थे की तीन वड़ा पाव एक समोसा एक थम्ज़-उप ने उत्पात मचाना चालू कर दिया था। हम एक तरफ हो घरवालों से नज़रें चुरा कर ज़ोरदार आवाज़ के साथ हलके हो ही रहे थे की अचानक हमारा मोबाइल ढिंका-चिका, ढिंका-चिका की चीखो पुकार करने लगा। हमने भी माहौल को गरम करते हुए हु हा की हुंकार भरी और गला साफ़ करने वाली आवाज़ का सहारे लेते हुए फ़ोन उठा लिया और सामने वाले की कर्कश आवाज़ को कोयल सी मधुर जान कर, खुद को सम्मान देते हुए हमने कहा "गमछा स्पीकिंग" और सामने से वही कर्कश सी आवाज़ जैसे अमरीश पूरी जी का भी गला बैठ गया हो "अरे मुन्ना बिसेस्वर बोल रहें हैं महबूब स्टूडियो से और फिर क्या था जैसे समय ही रुक गया हो, अरे भैया महबूब स्टूडियो से फ़ोन आया था। हाँ हाँ हैरान होने वाली बात तो है ही ना। आसान बात थोड़े ही न महबूब स्टूडियो से फ़ोन आना। बहरहाल अपने ही गंध से हमारी चेतना टूटी और हम भाग कर हवादार रोशनदान के पास जाने लगे और जाते जाते सोचने लगे की स्टूडीओ से कौन बोल रहा होगा? मात्र ३ दशमलव १४ सेकंड में हमने अपने पूरे खानदान का फ़ोटो अपनी आँखों के सामने से दौड़ा दिया पर ये साला बिसेस्वर कौन है ? तभी सामने से "अरे मुन्ना हम बोल रहा हूँ, बृजमोहन के साडू के जीजा के बहनोई के चाचा, तुम उस दिन मिले रहे थे न बृजमोहन भैया के घर और उनसे पूछ रहे थे की शूटिंग देखना है !!!
तभी मेरे दिमाग और दिल में एक साथ बिजली कौंधी और मुझे चाचा चौधरी की तरह "जिनका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है" याद आ गया की ये हमारे दोस्त के पड़ोस के मोहल्ले की किसी की शव यात्रा में मिले थे और वहीं बड़ी बड़ी छोड़ रहे थे। अब छोड़ रहे थे या सच बोल रहे थे मालूम नहीं, पर हमें फ़ोन करके इन्होंने ये साबित तो कर दिया था की इंसानियत ने अभी भारत देश नहीं छोड़ा है और रिश्तेदारी एक न एक दिन काम आ ही जाती है भले ही कितनी ही दूर की हो। बहरहाल वापस आते हैं, हम भी तपाक से बोले अरे चचा आप हैं?….हम आपकी आवाज़ पहचाने ही नहीं, हमें तो लगा अमरीश अंकल ने हमें क्यूँ कॉल किया होगा।
चाचा जी बोले "बेटा कल हमारे यहाँ बहुत बड़े स्टार की शूटिंग है, चले आना शूटिंग भी देख लेना और हम स्टार लोगों से मिलवा भी देंगे", लो ख़ुशी का ठिकाना कहाँ था, हमें तो सिर्फ़ शूटिंग देखना थी पर यहाँ तो स्टार लोगों से मिलने का निमंत्रण भी मिल गया था पर भावावेश पूछ बैठे, चचा स्टार जी कौन हेंगे?
बिंदु दारा सिंग - उधर से चाचा जी बोले। हमने फिर से दिमाग पर बैल जितना बोझ डाला, लेकिन याद नहीं पड़ता था कि ये बिंदु दारा सिंग है कौन। अब बिंदु हो पूर्ण विराम हो या अर्ध विराम हो हमें शूटिंग देखने से मतलब था।
तो साहब हुआ यूँ कि रात करवट लेते लेते ही काटनी पड़ी, और सुबह ६ बजने से और कमबख्त अखबार वाले के आने से पहले ही नहा धो कर हम तैयार हो लिए। अखबार वाला जिनका नाम उनके स्वरूप से थोड़ा भिन्न मालूम पड़ता है, जितना उनका शरीर है उतना बड़ा हमारे गाँव में बरगद के पेड़ का तना हुआ करता था। जाने दीजिए वो सब, हाँ तो सुन्दर जी ने अख़बार मरोड़ कचोड़ कर हमेशा की तरह हमारी ओर फेंका और हमने भी अभय कुरुविला जी की तरह कैच करने का निरर्थक प्रयास किया और विफल हो गए। सुन्दर की मुस्कुराहट से ही उनकी मन की भावना प्रकट हो गई थी, जो हमें हीन होने के एहसास करा रही थी, फिर सुंदर जी ट्रिन ट्रिन की ध्वनि करते हुए आगे निकल लिए।
इतने में हमारी चाय जो जल कर काढ़ा बन गई थी हमें किचन मैं खींच ले गई। जला हुआ पतीला मांजने के भय से हमने पतीले को नलके के नीचे रख पानी चला उसे ठंडा किया और हमारी धर्मपत्नी जो हमारी उत्तेजना हमारी लालसा को बिना जाने अभी तक मायके की सैर कर रहीं थी यानी के स्वप्नलोक में थीं उन्हें बिना बताए हम बाहर से दरवाज़ा धीरे से बंद करके अँधेरी रेलवे स्टेशन पर जा पहुंचे। इस बात का हमें पूरा पूरा अनुभव और ज्ञान था कि यदि ट्रैन भरी हुई आये तो अपने सामान को अपना शरीर का अभिन्न अंग मान कर किस प्रकार ट्रैन में घुसना है यानी की सवार होना है और गाय जैसा व्यवहार न करके बल्कि बैल समान स्वभाव से दूसरों को खदेड़ते हुए डब्बे में चढ़ जाना है। पर क्या बताएं आप लोगों को ईश्वर की इतनी अनुकम्पा, जैसे पल पल हमारे सिरहाने ही हो, पहले बिना माँगे महबूब स्टूडीओ से कॉल आ गया और आज रविवार निकल आया।ट्रैन मानो जैसे हमारे लिए पूरी तरह ख़ाली सी ही चली आई हो, बस फिर क्या था हमने स्वयं को एक राजा-धिराज टाइप सम्मान देते हुए डब्बे में प्रवेश किया और सभी ख़ाली सीटों में से खिड़की वाली ख़ाली सीट पर विराजमान हो गए, हमने रजनीकांत जी की कई फिल्में देख ही रखी थीं तो हमने वैसे ही टांग पर टांग रख कर बैठना उचित समझा। ट्रैन ने अब तक अँधेरी स्टेशन छोड़ चुकी थी और विले-पार्ले आते आते मोर नुमा कई आकृतीयों को हमने ट्रैक के सहारे और किनारे बैठा पाया। और फिर अचेतन में से एक चेतना का उदय हुआ और हमें आदरणीए साहित्यकार प्रेम चंद जी के संसार में ले जा कर खड़ा कर दिया।
इतना दुःख इतनी वेदना इतनी सहन शक्ति केवल उपन्यास के पात्रों में सम्भव है या इन लोगों में जो मुर्गी के दड़बों के सामान झुग्गी बस्तियों में रह कर ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, जहां सूरज की रोशनी भी तब आती है जब छत टूट ज़ाया करती है, पानी की समस्या जैसे स्वास गिन गिन कर लेने को कह दे कोई, एक छोटे से झोंपड़े में १८ - २० लोगों का परिवार। अब अधिक व्याख्या करूँगा तो एक उपन्यास की संरचना हो जाएगी जिसका शीर्षक शायद "एक कड़वा सच" होगा जिसे हम आँखें खोल कर रोज़ देखते हैं पर हमें जाने क्यूँ नज़र नहीं आता। और हम खुद को दिलासा देते हैं की हम ठीक है और हमें इनसे क्या वास्ता।
लो बांद्रा स्टेशन आ गया, अब यहाँ से बस पकड़ कर महबूब स्टूडीओ जाना होगा। अजी हाँ आज तो ऑटो में ज़ाया जा सकता है, इंसान पैसा क्यूँ कमाता है बताइए ? अरे भई ताकि दूसरों को बता सके की हम भी कहीं के अमीर हैं !
स्टूडीओ से वापस आकर बात करता हूँ आपसे !!!
सुंदर लिखा है
ReplyDeleteआभार!!!
DeleteBahut rochak hai. Agey ko kahaani ka intezar rahega !
ReplyDeletethank you!!
DeleteApp Achha Likhte ho.....like we are moving along with the event.
ReplyDeleteWaiting for the next....
thank you!
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