ख़ामोशी बोलती है

ख़ामोशी बोलती है

शोर चुप कराता है

आँखें कहतीं हैं

ज़ुबान पर ताला लग जाता है

कोई होता है 

कोई होकर भी नहीं हो पाता है

कुछ सपने सच होते हैं 

और कभी सच भी सपना रह जाता है

कभी बहुत कुछ बोल कर भी नहीं बता पाते 

कभी बिना बोले ही पता चल जाता है

किसी दुख में भी आँसू नहीं आ पाते 

और कहीं खुशियों में गम भर जाता है

तुझ को समझूं या खुद को समझाऊं 

ये तेरे होने का दर्द है 

या तेरे चले जाने की ख़ुशी

भला ऐसा भी कोई रूठ जाता है

निराशा में भी आशा होती है 

प्रेम की भी कोई परिभाषा होती है?

तेरे मेरे बीच की दूरी दो कदम भर ही है

पर दो कदम भर चलने के लिए  

भला क्या कोई सारी जिंदगी लगाता है।

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