पेट की भूख
पेट की भूख ने जाने कब मुँह पर टाला जड़ दिया
मालूम ही नहीं पड़ा
अब मैं खुद से जीत नहीं पाता हूँ
ये सोच कर खुद से लड़ना छोड़ दिया है
ख्वाहिशें दूर तक जाने की थीं
पर अब चल कर बाजार तक चला जाता हूँ
आँखें सूख सी गई हैं
पानी मार कर रोने का एहसास दिला देता हूँ
मुस्कुराने की वजह ही नहीं मिलती
ये सोच कर गाल ऊपर की ओर चढ़ाता हूँ
साथी कब ज़िम्मेदारियाँ बन गए
रोज़ काँधों से पूछता हूँ और
हांथों को समझाता हूँ
कहने को बहुत कुछ होता था
पर अब ज़ुबान निकलती नहीं है
क्यूंकि होंठों को रोज़ सी कर बाहर आता हूँ
शिकायत करने के लिए उँगलियों का उठना ज़रूरी है
पर कल का राशन कहाँ से आएगा ये सोच कर
उँगलियों की मुठ्ठी बना बगलों में दबा जाता हूँ।
पेट की भूख ने जाने कब मुँह पर टाला जड़ दिया
ये बात अब मैं समझ नहीं पाता हूँ !
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