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ख़ामोशी बोलती है

ख़ामोशी बोलती है शोर चुप कराता है आँखें कहतीं हैं ज़ुबान पर ताला लग जाता है कोई होता है  कोई होकर भी नहीं हो पाता है कुछ सपने सच होते हैं  और कभी सच भी सपना रह जाता है कभी बहुत कुछ बोल कर भी नहीं बता पाते  कभी बिना बोले ही पता चल जाता है किसी दुख में भी आँसू नहीं आ पाते  और कहीं खुशियों में गम भर जाता है तुझ को समझूं या खुद को समझाऊं  ये तेरे होने का दर्द है  या तेरे चले जाने की ख़ुशी भला ऐसा भी कोई रूठ जाता है निराशा में भी आशा होती है  प्रेम की भी कोई परिभाषा होती है? तेरे मेरे बीच की दूरी दो कदम भर ही है पर दो कदम भर चलने के लिए   भला क्या कोई सारी जिंदगी लगाता है।

ग़लतफ़हमी

ग़लतफ़हमी में जीने का एक फायदा है,  सब कुछ मिल जाता है वहां, साँसों के अलावा ! दुनिया रोशन किसी और से है, पर चिरागों को ये बात कोन समझाये! कोशिश करते रहे हाथ बढ़ा कर उनको मनाने की  आखिर में उन्होंने हमारे हाथ काट कर दरवाज़ा बंद कर दिया ! 

नोट बंदी

ये उस दिन के बाद की बात है जब रात ८ बजे के बाद भारत देश, लगभग सारा देश सो नहीं पाया था। ५०० और १००० रुपय के नोटों का चलन उस दिन की मध्य रात्रि से बंद होना था।  अगले दिन से सारा देश एक साथ बहार आ कर खड़ा हो गया था। सभी धर्मों के लोग सभी जातीयों  के लोग सभी वर्णो के लोग सब एक साथ एक के पीछे एक शांति से बैंकों की लाइनों में साथ आ गए थे। वहीं किसी एक लाइन में मैं भी खड़ा था और देख पा रहा था की किसी को भी कुछ समझ नहीं आ रहा है, पर सब प्यार से एक दूसरे से हाल चाल पूछ रहें हैं. मुद्दतें हो गई थी जिन दोस्तों से हुई मुलाकात हुए उनमें से कोई ५ जन आगे खड़ा था तो कोई बहुत पीछे, बस मुस्कुराकर हाथ हिला देते थे, खुद भी पसीने में थे और पास रखे कम या ज्यादा सब गाँधी भी पसीने में भीगे दिखलाई पड़ रहे थे, वो किस्से कहानियाँ, वो कॉलेज की यादें, वो स्कूल की शरारतें, फिर बतलाई, दोहराई जा रही थीं। किसी को वक़्त का इंतज़ार नहीं था, किसी को कोई फ़िक्र नहीं थी की कहीं जाना है, लेट हो रहे हैं, मेरे साथ कुछ और लोग भी थर्मस में चाय कॉफ़ी, पार्ले जी बिस्कुट ले आया करते थे, कोई किसी की शर्म नहीं कर रहा था, बस थैले ...

महबूब स्टूडियो

रात बड़ी तकलीफ देह गुज़री, कई करवटों के बदलने के बाद भी नींद का नामों निशान नहीं था। गोया हुआ यूँ की हमने कोई गलती तो की नहीं थी कि हमें किसी चीज़ की घबराहट रही हो और ये बात भी आपसे पहले ही बता रहे हैं ताकि आप भी कोई ग़लत मतलब ना निकल लें और एक साफ़ सुथरी घटना के मूक दर्शक बने रह सकें। तो साहब हुआ यूँ की शाम ८ बजते बजते हम अपने पायजामे और बनियान में जा बसे थे, और एकांत में खिड़की के सहारे बाहरी दुनिया को भरे पेट गालियाँ दे ही रहे थे की  तीन वड़ा पाव एक समोसा एक थम्ज़-उप ने उत्पात मचाना चालू कर दिया था। हम एक तरफ हो घरवालों से नज़रें चुरा कर ज़ोरदार आवाज़ के साथ हलके हो ही रहे थे की अचानक हमारा मोबाइल ढिंका-चिका, ढिंका-चिका की चीखो पुकार करने लगा। हमने भी माहौल को गरम करते हुए हु हा की हुंकार भरी और गला साफ़ करने वाली आवाज़ का सहारे लेते हुए फ़ोन उठा लिया और सामने वाले की कर्कश आवाज़ को कोयल सी मधुर जान कर, खुद को सम्मान देते हुए हमने कहा "गमछा स्पीकिंग" और सामने से वही कर्कश सी आवाज़ जैसे अमरीश पूरी जी का भी गला बैठ गया हो  "अरे मुन्ना बिसेस्वर बोल रहें हैं महबूब स्टूडियो से और फिर ...

तू चल मैं आता हूँ

तू चल मैं आता हूँ ये तेरा वहम है या अहम बतलाता है आसमान क्या देखता है  चलने के लिए मिली ज़मीन को झुठलाता है  सपनों की उड़ान के लिए  हक़ीक़त को भूल जाता है  चलने वाले दूसरे के भरोसे नहीं रहते  जो साथ चलना जानते हैं  वो चलने को नहीं कहते  चल देते हैं  मुहब्बत की नुमाइश आँखों से रोज़ करने वाले  प्यार करने की नज़र खो देते हैं  फरेब की मिट्टी में झूठ बोल कर सच्चाई को दबाया जाता है  पर वक़्त की आंधी में एक दिन सच कमल बन कर सामने आ ही जाता है तू चल, मैं आता हूँ मैं कब का निकल चला हूँ  तुझे हूँ बस यही दिखलाता हूँ

फ़िल्मी कीड़ा!

रात बड़ी तकलीफ देह गुज़री, कई करवटों के बदलने के बाद भी नींद का नामो निशाँ नहीं था. अब गोया यूँ की हमने कोई गलती तो की नहीं थी की हमें किसी चीज़ की घबराहट हो. चलो  ये  बात भी आपसे शेयर कर किये देता हूँ, ताकि आप कोई शक या गलत फहमी न रखें और एक साफ़ सुथरी सत्य घटना का आनंद ले सकें। तो साहब हुआ यूँ की शाम 7 बजते - बजते हम अपने पायजामे और बनियान में जा बसे थे और एकांत में खिड़की के सहारे खड़े होकर बाहरी  दुनिया को गालियाँ दे ही रहे थे की इस बीच जब हम एक तरफ हो कर दुनिया से नज़रें चुरा कर एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ हलके हो रहे थे तभी अचानक से हमारा मोबाइल फ़ोन, ढिंका चिका ढिंका चिका की चीखो पुकार करने लग गया। हमने भी माहौल  को गरम करते हुए हु हा हु हा की और गला साफ़ करने वाली आवाज़ का सहारे लेते हुए "हॉलो" का उच्चारण किया और फिर जैसे समय रुक गया।  अरे भैया मेहबूब स्टूडियो से फ़ोन था। हाँ- हाँ आपकी भी आँखें बड़ी बड़ी खुल गई ना......  तो क्या आसान बात थोरे ही न है की मेहबूब स्टूडियो से किसी को फ़ोन आना। बहरहाल अपने ही गंध से हमारी चेतना टूटी और हम भाग कर हवादार रोशनदान के पास पहुंच ...

यादों का पिटारा

आज दिल को क्या टटोला, यादों का पिटारा खुल गया, जो छुपा रखा था जले हुए कागज का किनारा मिल गया, कुछ अल्फ़ाज़ मिले कुछ बातें, कुछ सूनी, कुछ जागी रातें, कुछ जागती आंखों के सपने मिले,  कुछ जो पराए हुए वो अपने मिले, कुछ मिले जो खुशियाँ ले गए, और कुछ मिले जो आँसू दे गए, फिर थोड़ा और गहरा खोजा तो बचपन मिला, जो मां के आंचल में छुपा था, अटखेलियाँ करता, गिरता पडता, माँ के आँचल में जा छुपा था, फिर थोड़ी सी जवानी मिली, बाबूजी की सीखों के साथ कानो को खींचती हुई कहानी मिली, वो दर्द भी, दांत भी, मुस्कराहट दे गई, फिर बड़े भाई का वो कमीज मिला जो मैंने स्याह कर रख छोड़ा था, और बहन का चीख कर मां को बुलाना मिला,  फिर रोते हुए उसके चेहरे पर हसाना मिला,  थोड़ा ही सही खुशियों का खजाना मिला, और फिर तुम मिली, एक सुनहरी धूप का एक पल जो था वो सब ओर बिखर गया, और बिखर गई वो जुल्फ, जो कभी भी काली घटा बन जिंदगी में चली आती थी, तुम मिलती है तो मुस्कुराहट बिखरती थी,  और न मिलती तो आँखें धुंधली हो जाती थी, और यादों का पिटारा भर गया,  मैं मैं से हम हुए,  और वक्त मेरा घर हमारा कर गया, आज दिल को ...