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तरक्की कि परिभाषा

तरक्की कि परिभाषा,  थोड़ी उम्मीद थोड़ी आशा,  बड़े से सपने बुनो,  सही दोस्त चुनो,  कोशिश हर बार करो,  दुश्मनी से अच्छा दुश्मन को माफ़ करो,  ग़लती ख़ुद की ना माफ करो,  कोई और करे थोड़ा इंसाफ करो,  आधी हिम्मत भी काम आती है,  दुआ सच्चे दिल की क़बूल की जाती है, छोटे रास्ते ही बड़ी मंज़िलों पर है ले जाते,  आत्मविश्वास के सामने ही लोग हैं सर झुकाते,  एक कदम एक कदम चलने से  हज़ारों मील के रास्ते भी है कम पड़ जाते, दुःख सबको है मिलता, पर जीतते वही हैं  जो अपने लक्ष्य से नज़र नहीं हटाते। 

कोशिश

सपने शहर देख कर नहीं लिए जाते,  उम्मीदों का दामन सड़कों से नहीं पकड़ा जाता,  प्यार शक्ल देख कर ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाता,  बारिश तुझे तेरे शहर में कम या ज्यादा नहीं भिगोती,  तेरे शहर में आसमान ज्यादा नीला नहीं नज़र आता,  आंसुओं में नमक तेरे शहर में भी उतना ही होता है,  दिल किसी का भी हो, जब भी दुखी होता है उतना ही रोता है, मोहब्बत चीजों से नहीं ज़िंदा से की जानी चाहिए है, इज़्ज़त पीठ पीछे की जाये तो सच्ची मानी जानी चाहिए,  नजदीकियां पास रहने से नहीं,  साँसों की गर्मी से महसूस की जाती है,  क्यूंकि दिल को नहीं पता चलता कि  आँखें ख़ुशी हो  या ग़म अक्सर क्यों भीग जातीं हैं, मंज़िल चाहे कितनी भी दूर हो रास्तों से डरना नहीं चाहिए, हाथों की लकीरें चाहे कितनी भी छोटी हों,  मेहनत की कलम से बड़ी कर देना चाहिए, सपने जागते हुए भी देखे जाते हैं,  जो शीर्ष पर पहुंचे है,  उदाहरण उन्हीं के दिए जातें हैं।

ज़िंदगी

सफ़ेद रंग थोड़े ना होता है,  आँखों को बिना काले रंग के सुन्दर कौन कहता है,  नीला आसमान सिर्फ़ ज़मीन से नज़र आता है, पानी रंग और आकार कभी भी बदल पाता है, पक्षिओं का घर घोंसला कहलाता है, किसी के ना होने का ग़म ज़ुबान से बयाँ नहीं हो पाता है,  और किसी के मिल जाने की ख़ुशी दिल आंसुओं से आँखों को भिगो कर बताता है, कोई सिर्फ़ मतलब के लिए प्यार करे वो जीते जी दूसरों की नज़रों में मर जाता है, और कोई बेवजह मदद करे तो वो फ़रिश्तों सा बन जाता है, माँ बाप की जगह अक्सर कोई नहीं ले पाता है, ग़लतफ़हमी हो तो भाई-भाई का दुश्मन हो जाता है, जो वक्त पड़ने पर अपनों का साथ छोड़ दे, उन्हें वक्त एक ना एक दिन आईना ज़रूर दिखलाता है, और जब एक दिन चले ही जाना है फिर ना जाने क्यूँ  इंसान इतनी दौलत और कई मकान बनाता है। आपस में प्यार हो तो एक छोटे से  आशियाने में  इंसान ख़ुशियों का संसार बसा पाता है।  कहने को वक़्त वक़्त होता है पर  इंसान अपनी सोच से उसे अच्छा या बुरा बनाता है। पेट की भूख एक रोटी से भी बुझती है,  और पैसो...

मदर सा

सुशेंद्र कुमार चट्टोपाध्याय आजीवन अमरीका में रहे। अब उम्र का दौर बाकी सब दौरों को पीछे छोड़ गया था, और बच्चे अपनी अपनी ज़िन्दगी में बिज़ी हो गए थे तो उनका मन मानुष माटी के लिए पीड़ित हो गया और चले आये वापस अपने देश। अब जब आ ही गए थे पुश्तैनी मकान में जहाँ कभी इन्हीं तंग गलियों में घोडा गाड़ी चला करती थी अब सरपट ई-रिक्शा चलते हैं, गलियां वही पुरानी थी जान पहचान वाले इक्का दुक्का कोई बचा होगा। तो घूम घूम कर गलियां देख रहे थे।  आज जाने क्यों चटो जी सवेरे से ही खुश दिखलाई पड़ रहे थे मानो अभी-अभी कॉलेज पास किए हों। शायद आज़ादी का एहसास हुआ होगा, शायद क्या हुआ ही होगा। अब मतलब ना पूछिए जनाब, आपको आईडिया भी नहीं होगा कि कितनी सख़्ती है विदेशों में। अब यहाँ कितना आराम है कहीं भी हल्का हो लो, जब मन चाहा थूक लो या मन न भी करे तो भी थूकते रहो। मैं तो कहता हूँ कि थूकने का राष्ट्रीय स्तर पर खेल करवाया जाना चाहिए। थूको प्रतियोगिता।  अनिवेज़ आगे बढ़ते हैं, नहीं तो आप लोग आगे बढ़ जाएंगे। तो चटो बाबू घूमने निकल पड़े बाज़ार की ओर, वक़्त दोपहर का रहा होगा, चटो बाबू को कुछ भूख सी लगने लगी तो उन्होंने पहली गोश्...

बेटा और माँ

बेटे को लोग जब चिढ़ाते हैं तो माँ पल्लू से चेहरा पोंछ कर कहती है  तू किसी हीरो से कम है क्या, राजकुमारी ही मिलेगी तुझे,  क्लास में लड़ाई हो जाए तो, स्कूल ही गन्दा है,  प्यार में फेल हो जाता है, तो लड़की पसंद ही नहीं थी मुझे,  पापा डांटें तो, पापा को समझ नहीं है,  बाइक पंक्चर हो जाये तो, बेटा कार ले ले थक जाता होगा,  रोटी थोड़ी सी सूख जाए, हाँ बेटा आटा ही ख़राब आया है  अगली बार ख़ुद पिसवा कर लाऊँगी,  माँ भूख नहीं है, माँ दौड़ कर नज़र लग गई है मेरे बच्चे को,  सुनो जाकर जूस ले आइये मुझे भी पीना है, माँ थकती नहीं है,  बेटा भीग कर आता है, माँ बारिश को कोसने लगती है "मेरे बेटे को भिगो दिया थोड़ी देर से नहीं आ सकती थी क्या", लेकिन जब बेटे की लाश घर आये तो माँ क्या बोले किसे दोष दे,  सरकार को  या  आतंक को ।   ख़ुदा को या भगवान को।  मौलवियों को या पंडितों को।  या फिर  सत्ता के गलियारों में घूमती ज़िंदा लाशों को, तू फ़ौज में था या सड़क पर,  तू अलग था या शामिल,  तूने कोई किताब भी नहीं पड़ी,  तूने तिलक या टोप...

मिलने की ख़ुशी

कोई मिला कोई छूट गया,  कुछ बना कुछ टूट गया,  कुछ अपने पराये हो गए,  कुछ पराये अपने हो गए,  कुछ सच सपने रह गए,  और कई सपने सच हो गए,  कुछ को सालों लग गए बनाने में, कुछ ने सिर्फ एक पल  लिया  जाने में, कुछ दर्द दे गए, कुछ खुशियां बाँट गए,  सफ़र में कई मिले और मिलते रहेंगे,  कई आते, कई जाते रहेंगे,  कुछ सीख जाएंगे, कई सीखा जाएंगे, कई मुखौटे है, कुछ तो उम्मीदों से भी छोटे हैं, लम्बी तो रातें भी होती हैं, ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, मुड़ कर देखो तो खोने का ग़म नहीं  मिलने की ख़ुशी रहनी चाहिए।

रेड लाइट

जैसे ही ड्राइवर ने इग्निशन के गले में चाभी डाल कर जो घुमाई, हमें फैजुद्दिन चचा की याद आ गई, बस यूँ कहिये की आँख बंद कर लीजिये और उन्हें हाज़िर खड़ा पाइये। चाभी वो ऐसे घुमा रहा था जैसे फैजुद्दिन चचा खाँस रहे हों और चाची मुँह दबा रहीं हों की बहु जाग न जाए।  कम से कम ७ या ८ बारी गला दबाने यानि की चाभी घुमाने के बाद जो झमझमा के बस चालू हुई तो एक बार को लगा कि खड़ा हो कर सिटी ही बजा दूँ,  फिर ज़हन में ख़याल आया की मेरठ नहीं मुंबई है।   तो साहब मुंबई से नाशिक का सफर चालू हो गया। पहले १५ मिनट तो ऐसे गुज़र गए के पता ही नहीं चला। फिर आ गई लालमुँहि  रेड लाइट। अब रेड लाइट आते ही अपने लल्लन की आँखों में चमक आ गई, किस्सा थोड़ा पुराना है पर बता ही देते हैं, आप कहाँ भागे जा रहे हैं, परसो की ही बात ले ली जिए, लल्लन के मुँहबोले चच्या ससुर की मौसी के पोते के मामा की बहिन के देवर के एकलौते सपूत जो अभी अभी कक्षा ३ में आएं हैं पूछ बैठे, फूफाजी ये रेड लाइट एरिया क्या होता है। अब रेड लाइट एरिया सुनते ही समझदार लोगों के कानों में घंटियां  बजने लगती हैं, और भोली जनता को केवल लाल बत्ती ही ...