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फ़िल्मी कीड़ा!

रात बड़ी तकलीफ देह गुज़री, कई करवटों के बदलने के बाद भी नींद का नामो निशाँ नहीं था. अब गोया यूँ की हमने कोई गलती तो की नहीं थी की हमें किसी चीज़ की घबराहट हो. चलो  ये  बात भी आपसे शेयर कर किये देता हूँ, ताकि आप कोई शक या गलत फहमी न रखें और एक साफ़ सुथरी सत्य घटना का आनंद ले सकें। तो साहब हुआ यूँ की शाम 7 बजते - बजते हम अपने पायजामे और बनियान में जा बसे थे और एकांत में खिड़की के सहारे खड़े होकर बाहरी  दुनिया को गालियाँ दे ही रहे थे की इस बीच जब हम एक तरफ हो कर दुनिया से नज़रें चुरा कर एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ हलके हो रहे थे तभी अचानक से हमारा मोबाइल फ़ोन, ढिंका चिका ढिंका चिका की चीखो पुकार करने लग गया। हमने भी माहौल  को गरम करते हुए हु हा हु हा की और गला साफ़ करने वाली आवाज़ का सहारे लेते हुए "हॉलो" का उच्चारण किया और फिर जैसे समय रुक गया।  अरे भैया मेहबूब स्टूडियो से फ़ोन था। हाँ- हाँ आपकी भी आँखें बड़ी बड़ी खुल गई ना......  तो क्या आसान बात थोरे ही न है की मेहबूब स्टूडियो से किसी को फ़ोन आना। बहरहाल अपने ही गंध से हमारी चेतना टूटी और हम भाग कर हवादार रोशनदान के पास पहुंच ...

यादों का पिटारा

आज दिल को क्या टटोला, यादों का पिटारा खुल गया, जो छुपा रखा था जले हुए कागज का किनारा मिल गया, कुछ अल्फ़ाज़ मिले कुछ बातें, कुछ सूनी, कुछ जागी रातें, कुछ जागती आंखों के सपने मिले,  कुछ जो पराए हुए वो अपने मिले, कुछ मिले जो खुशियाँ ले गए, और कुछ मिले जो आँसू दे गए, फिर थोड़ा और गहरा खोजा तो बचपन मिला, जो मां के आंचल में छुपा था, अटखेलियाँ करता, गिरता पडता, माँ के आँचल में जा छुपा था, फिर थोड़ी सी जवानी मिली, बाबूजी की सीखों के साथ कानो को खींचती हुई कहानी मिली, वो दर्द भी, दांत भी, मुस्कराहट दे गई, फिर बड़े भाई का वो कमीज मिला जो मैंने स्याह कर रख छोड़ा था, और बहन का चीख कर मां को बुलाना मिला,  फिर रोते हुए उसके चेहरे पर हसाना मिला,  थोड़ा ही सही खुशियों का खजाना मिला, और फिर तुम मिली, एक सुनहरी धूप का एक पल जो था वो सब ओर बिखर गया, और बिखर गई वो जुल्फ, जो कभी भी काली घटा बन जिंदगी में चली आती थी, तुम मिलती है तो मुस्कुराहट बिखरती थी,  और न मिलती तो आँखें धुंधली हो जाती थी, और यादों का पिटारा भर गया,  मैं मैं से हम हुए,  और वक्त मेरा घर हमारा कर गया, आज दिल को ...

कोई नई बात नहीं ... पुरानी है!

एक छोटी सी दीया बाती भी एक बड़े कमरे को उजाले से भर देती है,  खुशी कितनी भी हो, हमेशा ही कम पड़ती है,  ज्यादा हँसी भी आँसू ले आती है,  ग़म कितना भी छोटा हो सारी दुनिया भुला देता है,    छोटी छोटी सी यादों में गहरे गहरे ज़ख्म छुपे होते हैं, कई फैसले, वक़्त और कलम के बीच रुके होते हैं, ये भी कोई नई बात नहीं पुरानी है,   हम पर जो बीत रही है,  वो तुम्हारे लिए बस एक गुज़री हुई कहानी है.

सफ़ेद रंग थोड़े ही ना होता है

सफ़ेद रंग थोड़े ही ना होता है, आँखों को बिना काले रंग के सुन्दर कौन कहता है,  नीला आसमान सिर्फ़ ज़मीन से ही नज़र आता है, पानी का रंग और आकार कभी भी बदल जाता है, पक्षीयों का घर घोंसला कहलाता है, किसी के ना होने का ग़म ज़ुबान से बयाँ नहीं हो पाता है,  और किसी के मिल जाने की ख़ुशी दिल आँखो को भिगो कर बताता है, कोई सिर्फ़ मतलब के लिए प्यार करे,  वो जीते जी दूसरों की नज़रों में मर जाता है, और कोई बेवजह मदद करे तो वो फ़रिश्तों बन जाता है, माँ बाप की जगह अक्सर कोई नहीं ले पाता है, ग़लतफ़हमी हो तो भाई-भाई का दुश्मन बन जाता है, जो वक़्त पड़ने पर अपनो का साथ छोड़ दे, उन्हें वक़्त एक ना एक दिन आइना ज़रूर दिखलाता है, एक ना एक दिन चले ही जाना है  फिर भी ना जाने क्यूँ,  इंसान इतनी दौलत और कई मकान बनाता है, आपस में प्यार हो तो एक छोटे से कमरे में भी  इंसान ख़ुशियों का संसार बसा पाता है,  कहने को वक़्त वक़्त होता है  पर इंसान अपनी सोच से उसे अच्छा या बुरा बनाता है, पेट की भूख एक रोटी से भी बुझती है,  और पैसों की भूख के लिए सारी ज़िंदगी गँवाता है, ना जाने क्यूँ ज...

अब भी शिकायत है!

भीगते हुए गालों को आँखों से अब भी शिकायत है  कि उनके लौट आने की उम्मीदों को छोड़ दें, आँखों को दिल से अब भी शिकायत है  कि वो दर्द को छिपाना छोड़ दें,   दिल को यादों से अब भी शिकायत है  कि वो रातों को बेवजह आना छोड़ दें, यादों को रातों से अब भी शिकायत है   कि वो चाँद को अपने साथ लाना छोड़ दे, रातों को सपनों से अब भी शिकायत है  कि वो नींदों में आना छोड़ दें,  सपनों को आँखों से अब भी शिकायत है की वो गालों को भिगाना छोड़ दे, आँखों को गालों से अब भी शिकायत है  की वो यादों के सहारे मुस्कुराना छोड़ दें.

चलूँ अकड़ अकड़

चलूँ अकड़ अकड़,  कभी सिरक सिरक,  कभी  तड़क भड़क,  नाचे मन ता थई या,  ता थई या ता थई या था,  पानी पी लूँ गुटक गुटक  नैनों में रखूं चटक मटक,  खाया कुछ नहीं पर,  गया सब गटक गटक,  कुछ काँट छाँट, कुछ उठा पटक, कभी लपट झपट, यूँ ही कभी मटक मटक, कभी उबल उबल, कहीं आइस आइस, कहीं डिफिकल्ट सा मुश्किल  कहीं नाइस नाइस, कभी बात बात पर, कहीं ज़ात पात पर,  कभी लड़ाई वडाई, कभी मिलना या मिठाई, कभी सोच वोच कर, कहीं नोच खरोंच कर, कहीं गर्मी में,  कहीं भीग कर, कहीं सर्दी में,  कहीं छींक कर, कभी हार कर,  फिर जीत कर,   ज़िन्दगी रास्ता ढूंढ ही लेती है.

ऐंठन

ये ऐंठन लाते कहाँ से हो,  ये सर उठा कर जाते कहाँ पर हो,   गोला तो एक है घूम घूम कर आते कहाँ से हो,  चले थे जहाँ से सर को उठाये,   सिकंदर हो या अकबर,  सभी है मिट्टी में दफ़्न, सर को झुकाये,  हवाओं का रुख मोड़ नहीं पाते हो,  पानी को बोतलों में बंद कर क्यों इतना इतराते हो,  उम्र निकल जाती है नाम कमाने में,  तुम यूँही शौक के लिए सर पर पाऊँ धरे जाते हो,  तू तू, मैं मैं, मेरा तेरा, वगैरह वगैरह ,  ऊंट भी पहाड़ के नीचे आ कर शरमा जाता है,   तुम्हें क्या बात का गुरूर है,  क्या आसमान तुम्हारी ड्योढ़ी पर आकर चने खाता है, गर्दन झुका कर देखो कितनो को तुमने कुचला है।  तुम्हारी जूती के नीचे कितनो का दम निकला है, ये ऐंठन लाते कहाँ से हो.