फ़िल्मी कीड़ा!
रात बड़ी तकलीफ देह गुज़री, कई करवटों के बदलने के बाद भी नींद का नामो निशाँ नहीं था. अब गोया यूँ की हमने कोई गलती तो की नहीं थी की हमें किसी चीज़ की घबराहट हो. चलो ये बात भी आपसे शेयर कर किये देता हूँ, ताकि आप कोई शक या गलत फहमी न रखें और एक साफ़ सुथरी सत्य घटना का आनंद ले सकें। तो साहब हुआ यूँ की शाम 7 बजते - बजते हम अपने पायजामे और बनियान में जा बसे थे और एकांत में खिड़की के सहारे खड़े होकर बाहरी दुनिया को गालियाँ दे ही रहे थे की इस बीच जब हम एक तरफ हो कर दुनिया से नज़रें चुरा कर एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ हलके हो रहे थे तभी अचानक से हमारा मोबाइल फ़ोन, ढिंका चिका ढिंका चिका की चीखो पुकार करने लग गया। हमने भी माहौल को गरम करते हुए हु हा हु हा की और गला साफ़ करने वाली आवाज़ का सहारे लेते हुए "हॉलो" का उच्चारण किया और फिर जैसे समय रुक गया। अरे भैया मेहबूब स्टूडियो से फ़ोन था। हाँ- हाँ आपकी भी आँखें बड़ी बड़ी खुल गई ना...... तो क्या आसान बात थोरे ही न है की मेहबूब स्टूडियो से किसी को फ़ोन आना। बहरहाल अपने ही गंध से हमारी चेतना टूटी और हम भाग कर हवादार रोशनदान के पास पहुंच ...