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मैं कौन हूँ

 मैं कौन हूँ ,  स्त्री हूँ बेचैन हूँ , बहन हूँ  माँ हूँ  बीवी हूँ  बेटी हूँ  मैं कौन हूँ ! माल हूँ  बेवफा हूँ  जान हूँ  किसी का पाप हूँ  किसी की रखैल हूँ  मैं कौन हूँ ! दुर्गा हूँ  लक्ष्मीं हूँ  सरवती हूँ  काली हूँ  देवी हूँ  8 दिन पूजी जाती हूँ  लेकिन माहवारी में रसोई नहीं जा पाती हूँ  मैं कौन हूँ।  घर में हूँ तो कैद हूँ  बाहर हूँ तो आवारा हूँ।  बहन हूँ तो घर में रहना चाहिए  माँ हूँ तो सब सहना चाहिए  बेटी हूँ तो चुप रहना चाहिए  बीवी हूँ तो कुछ नहीं कहना चाहिए।  बस देवी बने रहना चाहिए।  सब को जन्म देनी वाली  सबको सबसे पहला पाठ पढ़ाने वाली मुहे गूंगा बने रहना चाहिए।  मूर्ति बने रहना चाहिए कुछ नहीं कहना चाहिए सब सहते रहना चाहिए ! मैं कौन हूँ !

कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे

कुछ सुलझे  कुछ अनसुलझे,  कहीं सोच में फंसे, कभी सोच से निकले, यादों के पिटारे हमेशा बगल में रहते, छांट छांट कर किस्से कहते, कभी आँखें नम करते,  कभी गीले गालों वाली हसी का दम भरते, सांसों पर भी काबू कहां नहीं रहता, ख्वाबों से सारा दामन हमेशा भरा रहता,  कभी एक मुस्कान आने में सालों लग जाते,  और किसी को भुलाने में सदियाँ, कभी हाथी जैसी मस्त चाल,  कभी चीते से भी तेज ख्याल, लोग आते रहे पर गया कोई नहीं,  यादों के पिटारे से बचा कोई नहीं, रात रात भर बातें करना, कोई आहट हो तो डरना, हर एक आहट पर उनके आने की ख़ुशी करना फिर न आने पर मायूसी सा चेहरा करना, यादों ने बड़ा रुलाया है,  पर हसी से भी किसी एक याद ने चेहरे को सजाया है, बचपन लौट कर न आएगा,  जो बीत गया बस वो किस्सा या कहानी रह जायेगा, न जाने कब सीखेंगे न जाने कब जीना आएगा।  

शुक्ला जी की पार्टी

शुक्ला जी की पार्टी ख़तम होते होते पों और पाओं दोनो फटने को थे,  पहली पहर का नगर कीर्तन भी हलका हलका सुनाई पढ़ने लगा था,  और मुँआ राम पखारे बिना घड़ी देखे हुए आज भी समय पर अपना दूध देने के लिए घंटी पर घंटी बजा रहा था। अरे आप भी क्या. .. हसने लगे हैं, अरे भाई राम पखारे दूध नहीं देता है, उसकी बकरियाँ दूध देती है,! बकरियां क्यों ??, अरे भाई साहब गायों का तो लफड़ा चल रहा है ना,  आप तो जानते ही हैं, अब कल ही की बात है, हम यानी के अर्जुन कमल कुमार सिसोदिया और हमारे चार मित्र!!, अब फिर आप सोचने लगे हैं, हाँ भाई साहब आप से सहमत हूँ, मित्र तीन ही होते हैं पर एक आता जाता रहता है,  इसलिए चार कह दिया, अरे ये तो इंसेप्शन सिनेमा जैसा हो गया,  सपने में सपना और फिर एक छोटी सपनी।  बहरहाल सपनी तोड़ कर सपने में चलते हैं, यानी के इससे पहले वाले किस्से पर, यानी के कल ही की बात है वाले पर, हम चार दोस्त काणिये की दुकान पर चाय का ऑर्डर देकर बैठे ही थे कि काणिये के अब्बू… पंडित दीना नाथ सहाय जैसे दिखने वाले अकबरुद्दीन खुरैशी जी ने अपना बकाया मांग लिया।  अब बताइये स...

तरक्की कि परिभाषा

तरक्की कि परिभाषा,  थोड़ी उम्मीद थोड़ी आशा,  बड़े से सपने बुनो,  सही दोस्त चुनो,  कोशिश हर बार करो,  दुश्मनी से अच्छा दुश्मन को माफ़ करो,  ग़लती ख़ुद की ना माफ करो,  कोई और करे थोड़ा इंसाफ करो,  आधी हिम्मत भी काम आती है,  दुआ सच्चे दिल की क़बूल की जाती है, छोटे रास्ते ही बड़ी मंज़िलों पर है ले जाते,  आत्मविश्वास के सामने ही लोग हैं सर झुकाते,  एक कदम एक कदम चलने से  हज़ारों मील के रास्ते भी है कम पड़ जाते, दुःख सबको है मिलता, पर जीतते वही हैं  जो अपने लक्ष्य से नज़र नहीं हटाते। 

कोशिश

सपने शहर देख कर नहीं लिए जाते,  उम्मीदों का दामन सड़कों से नहीं पकड़ा जाता,  प्यार शक्ल देख कर ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाता,  बारिश तुझे तेरे शहर में कम या ज्यादा नहीं भिगोती,  तेरे शहर में आसमान ज्यादा नीला नहीं नज़र आता,  आंसुओं में नमक तेरे शहर में भी उतना ही होता है,  दिल किसी का भी हो, जब भी दुखी होता है उतना ही रोता है, मोहब्बत चीजों से नहीं ज़िंदा से की जानी चाहिए है, इज़्ज़त पीठ पीछे की जाये तो सच्ची मानी जानी चाहिए,  नजदीकियां पास रहने से नहीं,  साँसों की गर्मी से महसूस की जाती है,  क्यूंकि दिल को नहीं पता चलता कि  आँखें ख़ुशी हो  या ग़म अक्सर क्यों भीग जातीं हैं, मंज़िल चाहे कितनी भी दूर हो रास्तों से डरना नहीं चाहिए, हाथों की लकीरें चाहे कितनी भी छोटी हों,  मेहनत की कलम से बड़ी कर देना चाहिए, सपने जागते हुए भी देखे जाते हैं,  जो शीर्ष पर पहुंचे है,  उदाहरण उन्हीं के दिए जातें हैं।

ज़िंदगी

सफ़ेद रंग थोड़े ना होता है,  आँखों को बिना काले रंग के सुन्दर कौन कहता है,  नीला आसमान सिर्फ़ ज़मीन से नज़र आता है, पानी रंग और आकार कभी भी बदल पाता है, पक्षिओं का घर घोंसला कहलाता है, किसी के ना होने का ग़म ज़ुबान से बयाँ नहीं हो पाता है,  और किसी के मिल जाने की ख़ुशी दिल आंसुओं से आँखों को भिगो कर बताता है, कोई सिर्फ़ मतलब के लिए प्यार करे वो जीते जी दूसरों की नज़रों में मर जाता है, और कोई बेवजह मदद करे तो वो फ़रिश्तों सा बन जाता है, माँ बाप की जगह अक्सर कोई नहीं ले पाता है, ग़लतफ़हमी हो तो भाई-भाई का दुश्मन हो जाता है, जो वक्त पड़ने पर अपनों का साथ छोड़ दे, उन्हें वक्त एक ना एक दिन आईना ज़रूर दिखलाता है, और जब एक दिन चले ही जाना है फिर ना जाने क्यूँ  इंसान इतनी दौलत और कई मकान बनाता है। आपस में प्यार हो तो एक छोटे से  आशियाने में  इंसान ख़ुशियों का संसार बसा पाता है।  कहने को वक़्त वक़्त होता है पर  इंसान अपनी सोच से उसे अच्छा या बुरा बनाता है। पेट की भूख एक रोटी से भी बुझती है,  और पैसो...

मदर सा

सुशेंद्र कुमार चट्टोपाध्याय आजीवन अमरीका में रहे। अब उम्र का दौर बाकी सब दौरों को पीछे छोड़ गया था, और बच्चे अपनी अपनी ज़िन्दगी में बिज़ी हो गए थे तो उनका मन मानुष माटी के लिए पीड़ित हो गया और चले आये वापस अपने देश। अब जब आ ही गए थे पुश्तैनी मकान में जहाँ कभी इन्हीं तंग गलियों में घोडा गाड़ी चला करती थी अब सरपट ई-रिक्शा चलते हैं, गलियां वही पुरानी थी जान पहचान वाले इक्का दुक्का कोई बचा होगा। तो घूम घूम कर गलियां देख रहे थे।  आज जाने क्यों चटो जी सवेरे से ही खुश दिखलाई पड़ रहे थे मानो अभी-अभी कॉलेज पास किए हों। शायद आज़ादी का एहसास हुआ होगा, शायद क्या हुआ ही होगा। अब मतलब ना पूछिए जनाब, आपको आईडिया भी नहीं होगा कि कितनी सख़्ती है विदेशों में। अब यहाँ कितना आराम है कहीं भी हल्का हो लो, जब मन चाहा थूक लो या मन न भी करे तो भी थूकते रहो। मैं तो कहता हूँ कि थूकने का राष्ट्रीय स्तर पर खेल करवाया जाना चाहिए। थूको प्रतियोगिता।  अनिवेज़ आगे बढ़ते हैं, नहीं तो आप लोग आगे बढ़ जाएंगे। तो चटो बाबू घूमने निकल पड़े बाज़ार की ओर, वक़्त दोपहर का रहा होगा, चटो बाबू को कुछ भूख सी लगने लगी तो उन्होंने पहली गोश्...