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अब भी शिकायत है!

भीगते हुए गालों को आँखों से अब भी शिकायत है  कि उनके लौट आने की उम्मीदों को छोड़ दें, आँखों को दिल से अब भी शिकायत है  कि वो दर्द को छिपाना छोड़ दें,   दिल को यादों से अब भी शिकायत है  कि वो रातों को बेवजह आना छोड़ दें, यादों को रातों से अब भी शिकायत है   कि वो चाँद को अपने साथ लाना छोड़ दे, रातों को सपनों से अब भी शिकायत है  कि वो नींदों में आना छोड़ दें,  सपनों को आँखों से अब भी शिकायत है की वो गालों को भिगाना छोड़ दे, आँखों को गालों से अब भी शिकायत है  की वो यादों के सहारे मुस्कुराना छोड़ दें.

चलूँ अकड़ अकड़

चलूँ अकड़ अकड़,  कभी सिरक सिरक,  कभी  तड़क भड़क,  नाचे मन ता थई या,  ता थई या ता थई या था,  पानी पी लूँ गुटक गुटक  नैनों में रखूं चटक मटक,  खाया कुछ नहीं पर,  गया सब गटक गटक,  कुछ काँट छाँट, कुछ उठा पटक, कभी लपट झपट, यूँ ही कभी मटक मटक, कभी उबल उबल, कहीं आइस आइस, कहीं डिफिकल्ट सा मुश्किल  कहीं नाइस नाइस, कभी बात बात पर, कहीं ज़ात पात पर,  कभी लड़ाई वडाई, कभी मिलना या मिठाई, कभी सोच वोच कर, कहीं नोच खरोंच कर, कहीं गर्मी में,  कहीं भीग कर, कहीं सर्दी में,  कहीं छींक कर, कभी हार कर,  फिर जीत कर,   ज़िन्दगी रास्ता ढूंढ ही लेती है.

ऐंठन

ये ऐंठन लाते कहाँ से हो,  ये सर उठा कर जाते कहाँ पर हो,   गोला तो एक है घूम घूम कर आते कहाँ से हो,  चले थे जहाँ से सर को उठाये,   सिकंदर हो या अकबर,  सभी है मिट्टी में दफ़्न, सर को झुकाये,  हवाओं का रुख मोड़ नहीं पाते हो,  पानी को बोतलों में बंद कर क्यों इतना इतराते हो,  उम्र निकल जाती है नाम कमाने में,  तुम यूँही शौक के लिए सर पर पाऊँ धरे जाते हो,  तू तू, मैं मैं, मेरा तेरा, वगैरह वगैरह ,  ऊंट भी पहाड़ के नीचे आ कर शरमा जाता है,   तुम्हें क्या बात का गुरूर है,  क्या आसमान तुम्हारी ड्योढ़ी पर आकर चने खाता है, गर्दन झुका कर देखो कितनो को तुमने कुचला है।  तुम्हारी जूती के नीचे कितनो का दम निकला है, ये ऐंठन लाते कहाँ से हो.

जीवन, एक संघर्ष.......!!!

जीवन क्या है ?  एक संघर्ष, संघर्ष क्या है ? अपेक्षाओं से जन्मी विकृतियों का प्रयाय अपेक्षा क्या है ?  स्वंय को दुसरे के सुख में, खोज पाने की प्रतिस्पर्धा।  सुख क्या है ? एक अभिलाषा, एक आशा, इक बाहरी लोभ   आशा क्या है ? एक सुखद - दुखद अनुभव, एक स्वप्न जो जगते हुए देखते हैं।  स्वप्न क्या है ? जीवन और मृत्यु के बीच की डोर, मृत्यु क्या है ? अपेक्षाओं में उपेक्षाओं का आभास, उपेक्षा क्या है ?  स्वाभिमान का अभिमानी में परिवर्तित होना, अभिमानी कौन है ? जो मैं के लिए जीता हो, मैं कौन है ?  स्वयं से न मिल पाने पर क्रोध से उत्पन्न हुआ नश्वर शरीर, नश्वर शरीर क्या है ? आत्मा को ढोती काया, आत्मा क्या है ?  मृत्यु से ऊपर ईश्वर से नीचे,  ईश्वर क्या है ?  जीवन और मृत्यु का बोध, बोध क्या है ?  बुद्ध का मार्ग, बुद्ध कौन है ?  जिसको मार्ग मिल जाये, मार्ग क्या है ?  जीवन जीने की क्रिया,  जीवन क्या है ?  एक संघर्ष !!!

मैं कौन हूँ

 मैं कौन हूँ ,  स्त्री हूँ बेचैन हूँ , बहन हूँ  माँ हूँ  बीवी हूँ  बेटी हूँ  मैं कौन हूँ ! माल हूँ  बेवफा हूँ  जान हूँ  किसी का पाप हूँ  किसी की रखैल हूँ  मैं कौन हूँ ! दुर्गा हूँ  लक्ष्मीं हूँ  सरवती हूँ  काली हूँ  देवी हूँ  8 दिन पूजी जाती हूँ  लेकिन माहवारी में रसोई नहीं जा पाती हूँ  मैं कौन हूँ।  घर में हूँ तो कैद हूँ  बाहर हूँ तो आवारा हूँ।  बहन हूँ तो घर में रहना चाहिए  माँ हूँ तो सब सहना चाहिए  बेटी हूँ तो चुप रहना चाहिए  बीवी हूँ तो कुछ नहीं कहना चाहिए।  बस देवी बने रहना चाहिए।  सब को जन्म देनी वाली  सबको सबसे पहला पाठ पढ़ाने वाली मुहे गूंगा बने रहना चाहिए।  मूर्ति बने रहना चाहिए कुछ नहीं कहना चाहिए सब सहते रहना चाहिए ! मैं कौन हूँ !

कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे

कुछ सुलझे  कुछ अनसुलझे,  कहीं सोच में फंसे, कभी सोच से निकले, यादों के पिटारे हमेशा बगल में रहते, छांट छांट कर किस्से कहते, कभी आँखें नम करते,  कभी गीले गालों वाली हसी का दम भरते, सांसों पर भी काबू कहां नहीं रहता, ख्वाबों से सारा दामन हमेशा भरा रहता,  कभी एक मुस्कान आने में सालों लग जाते,  और किसी को भुलाने में सदियाँ, कभी हाथी जैसी मस्त चाल,  कभी चीते से भी तेज ख्याल, लोग आते रहे पर गया कोई नहीं,  यादों के पिटारे से बचा कोई नहीं, रात रात भर बातें करना, कोई आहट हो तो डरना, हर एक आहट पर उनके आने की ख़ुशी करना फिर न आने पर मायूसी सा चेहरा करना, यादों ने बड़ा रुलाया है,  पर हसी से भी किसी एक याद ने चेहरे को सजाया है, बचपन लौट कर न आएगा,  जो बीत गया बस वो किस्सा या कहानी रह जायेगा, न जाने कब सीखेंगे न जाने कब जीना आएगा।  

शुक्ला जी की पार्टी

शुक्ला जी की पार्टी ख़तम होते होते पों और पाओं दोनो फटने को थे,  पहली पहर का नगर कीर्तन भी हलका हलका सुनाई पढ़ने लगा था,  और मुँआ राम पखारे बिना घड़ी देखे हुए आज भी समय पर अपना दूध देने के लिए घंटी पर घंटी बजा रहा था। अरे आप भी क्या. .. हसने लगे हैं, अरे भाई राम पखारे दूध नहीं देता है, उसकी बकरियाँ दूध देती है,! बकरियां क्यों ??, अरे भाई साहब गायों का तो लफड़ा चल रहा है ना,  आप तो जानते ही हैं, अब कल ही की बात है, हम यानी के अर्जुन कमल कुमार सिसोदिया और हमारे चार मित्र!!, अब फिर आप सोचने लगे हैं, हाँ भाई साहब आप से सहमत हूँ, मित्र तीन ही होते हैं पर एक आता जाता रहता है,  इसलिए चार कह दिया, अरे ये तो इंसेप्शन सिनेमा जैसा हो गया,  सपने में सपना और फिर एक छोटी सपनी।  बहरहाल सपनी तोड़ कर सपने में चलते हैं, यानी के इससे पहले वाले किस्से पर, यानी के कल ही की बात है वाले पर, हम चार दोस्त काणिये की दुकान पर चाय का ऑर्डर देकर बैठे ही थे कि काणिये के अब्बू… पंडित दीना नाथ सहाय जैसे दिखने वाले अकबरुद्दीन खुरैशी जी ने अपना बकाया मांग लिया।  अब बताइये स...