Posts

आंसू नहीं जानते हैं !!

गालों पर फैलते काजल की कीमत  आंसू नहीं जानते हैं !! लहरों से डरने वाले समंदर नहीं लांघते हैं !! काग़ज़ के शेर अक्सर बारिशों में बाहर नहीं आते हैं  वक़्त पड़ने पर खून के रिश्ते जम जाते हैं  किताबों की पढ़ी बातें बस परीक्षा में लिख कर आते हैं  और असल ज़िन्दगी में जीने के फ़लसफ़े बदल जाते हैं  कोशिश करने से हार बुरी नहीं लगती  जो जीत जाते हैं वो ये बात समझाते हैं  जिनको आँखें मूँद कर देख लिए करते थे  अब वो आँख खोल कर भी नज़र नहीं आते हैं  बात तेरे मेरे की कभी थी ही नहीं  बस कुछ लोग बिना बोले लकीर खींच जाते हैं  उड़ तो लूँ पर आसमाँ छोटा पड़ने लगा है  बादलों में घर बनाया था   पर हवाओं ने सब इधर उधर कर दीया है  कोई चुटकी काट कर बता दो यारों  दिल पर किसने कब्ज़ा कर लिया है  छीन कर लाये थे उनको गैरों से  अब गैरों ने ही हमें चलता कर दीया है  कोई रोक लो पानी को, ज़मीन प्यासी है  सूरज ने भी बादलों पर पहरा कर दीया है  अरे आते जाते लोग ताना मारने लगे थे  हमने भी किसी किसी के लिए खुद को बहरा कर दीया है...

कांधा झुका नहीं है मेरा!

कांधा झुका नहीं है मेरा, बस वो दोस्त, अब दोस्त नहीं रहा मेरा।  कोशिश हजार की मनाने की, पर उसने थान रखी थी चले जाने की।  अच्छा हुआ उसने मुड़ कर नहीं देखा मैं आंसुओं को रोक नहीं पाता।   चल कर इतनी दूर आए थे भला ये भी कोई उम्र हुई छोड़ जाने की।   दरवाजा मैंने निकाल रख छोड़ा है, अब जरूरत नहीं पड़ेगी खटखटाने की।  खंजर अब नहीं बचे हैं घर में मेरे, तुम्हें जरूरत नहीं है घबराने के।  आईना भी तोड़ रखा है, क्या ही पड़ी है अब इतराने की।  आहिस्ता बोल कर समझाना बेमानी था, क्या ज़रूरत थी चीख कर निकल जाने की।  पड़ोसी अब अक्सर पूछ लेते हैं कि क्यों आवाजें कम आती है हमारे घर से।   मैं मुस्कुराता हूँ ये बोलकर, ज़रूरत नहीं पड़ती अब खुद को मनाने की 🙂

उधार लिया था

 कुछ उधार लिया था एक अनजान से,  अब वही ख्याल रखता है मेरा जान से ! रिश्तों की समझ आते आते बहुत वक़्त गुज़र जाता है,  अपनों का परायापन और परायों का अपनापन समझ से बहार हो जाता है ! दिल भरा भरा और जेबें अक्सर ख़ाली रहतीं हैं! यादें बहुत आती हैं और आँखें आँसू संभाले रहतीं हैं  पैसे रहते तो भी खर्च नहीं कर पाते हैं  अक्सर बूढ़े माँ बाप बच्चों की राह देखते देखते कहीं चले जाते हैं ! आदत भी ख़राब कर रखी है मैंने उनको मानाने की  उनकी भी आदत रही है बिना बताये चले जाने की  कोशिश की, एक दिन सब बोल दूँ  पर बुरा न लग जाये ये सोच कर तस्वीर के सामने से चला आया ! जाने कब वक़्त थम जाये या साँसे  अब बस मिल कर कह दूंगा सारी बातें !!

सुधा की वसुधा!

सुनो, छोटे  छोटे  मोज़े सिलने है, बाजार से ऊन ला कर दे दो  और सुनो थोड़ी इमली भी ले आना  और सुनो आम का अचार माँ जी से मँगवा दो  क्यूंकि बाजार के अचार में केमिकल मिक्स होता है  और सुनो न, काम वाली रख सकते हैं क्या?  "सुधा चल क्या रहा है"? क्या सुबह सुबह इतना बोल रही हो  कोई आ रहा है घर  कौन?  जो तुम्हारा अपना है  अरे कल ही माँ बाबा को कानपुर छोड़ कर आया हूँ  कौन आ रहा है?  वो तुम्हें पापा कह कर बुलाएगी  मतलब!!  तुम पापा बनने वाले हो  कल डॉ. कविता के पास गई थी  उन्होंने ही बताया  अरे वाह, पर तुमने ये क्यों कहा कि  वो पापा कह कर बुलाएगी  वो... मतलब.... मेरा कहना है कि... लड़का होगा  हाँ!! लड़का ही होगा कोई नाम सोचा है? मैडम लड़का ही होगा  मर्द हूँ मर्द  और मैंने सोचा है कि  राजबीर सिंह राजपूत का बेटा  विक्रम सिंह राजपूत  क्या बकवास है  वसुधा नाम रखूँगी  सुधा की वसुधा  नहीं नहीं लड़की वड़की नहीं  लड़का ही होगा  अरे लड़की हुई तो  तो क्या ...

मैं मुंबई हूँ!

जहाँ रातों को जाग कर दिन में सपने बेचे जाते हैं  जहां कोशिश करने पर मंजिलें मिल जातीं हैं  जब भी गिरने को हो तो एक बांह थाम लेती है  जहां तन्हाई का दामन समंदर थामे रहता है  और वक्त हमेशा आगे बढ़ने की सलाह देता है  जहां रोज उठने का एक मज़ा है  जहां खाली बैठना एक सज़ा है  जहां प्यार की कोई कमी नहीं है जहाँ आसमान ज़्यादा है पर ज़मीं नहीं   जहाँ सुबह की फ़ास्ट "सी एस टी" तक  और शाम की अँधेरी लोकल तक में दोस्त बन जाते हैं वो बंद आँखोँ से सच और खुली आँखोँ से सपने दिखाती है  जहां धक्के खाना, वडा पाओ सी आदत बन जाती है जहां गाय से ज्यादा दूधवाला दूध देता है  जहाँ टैक्सी में बैठते ही मीटर डाउन रहता है   जिसके पास बेस्ट है वो लाल बग्गी में बैठा हो ऐसा बतलाता है  जहाँ राज है जहाँ मनसे है जहाँ हर गली में एक सैनिक मिल जाता है  ये दुखों से भरा सूखों से भरा है  ये दिन में सोता, रातों को जगता शहर कहलाता है  ये मेरा शहर, मुंबई के नाम से जाना जाता है ! मैं मुंबई हूँ!

शिकायत किस से करूँ

हवाओं से क्या शिकायत करूँ, उन्हें तो बस बहना आता है दोस्तों से क्या नाराज़गी, उन्हें तो बस कहना आता है  औरत की भी क्या मज़बूरी है, उसे बस सहना आता है  लड़ते झगड़ते लोगों को देख सोचता हूँ, इन्हें कहाँ रहना आता है  हवा को कभी रुके हुए देखा है ? पहाड़ों को चलते हुए देखा है ? नदियों को कभी उल्टी बहती देखा है ? ज़िन्दगी से शिकायत किसको नहीं है  हर बात का जवाब किसके पास नहीं है  सफ़ेद बाल क्या बुढ़ापे की निशानी है ? सिन्दूर ना लगाने से पति की उम्र कम हो जाती है ? बच्चे दूसरों के अच्छे और अपने बुरे क्यों नज़र आते हैं  माँ बाप ज़िन्दगी भर बच्चों को पाल लेते हैं  तो बच्चे माँ बाप को आश्रम में क्यों छोड़ जाते हैं कहानियां नाना नानी सुनाते हैं और दादा दादी के हमेशा सच्ची वाली बात बताते हैं  जब मन उड़ सकता हैं तो हम उड़ क्यों नहीं पाते हैं सच्चे लोग कहाँ मिलते हैं  झूठों के अम्बार मिल जाते हैं  पत्नियाँ कहना क्यों नहीं मानती  पति भी किसी का बॉस  किसी का नौकर है क्यों नहीं जानती  आठ आने होने पर भी आधा रुपया ही क्यों बनता है    ३२ पैसों मे...

पेट की भूख

पेट की भूख ने जाने कब मुँह पर टाला जड़ दिया  मालूम ही नहीं पड़ा  अब मैं खुद से जीत नहीं पाता हूँ  ये सोच कर खुद से लड़ना छोड़ दिया है  ख्वाहिशें दूर तक जाने की थीं  पर अब चल कर बाजार तक चला जाता हूँ आँखें सूख सी गई हैं  पानी मार कर रोने का एहसास दिला देता हूँ  मुस्कुराने की वजह ही नहीं मिलती  ये सोच कर गाल ऊपर की ओर चढ़ाता हूँ  साथी कब ज़िम्मेदारियाँ बन गए  रोज़ काँधों से पूछता हूँ और  हांथों को समझाता हूँ  कहने को बहुत कुछ होता था  पर अब ज़ुबान निकलती नहीं है  क्यूंकि होंठों को रोज़ सी कर बाहर आता हूँ  शिकायत करने के लिए उँगलियों का उठना ज़रूरी है  पर कल का राशन कहाँ से आएगा ये सोच कर  उँगलियों की मुठ्ठी बना बगलों में दबा जाता हूँ।  पेट की भूख ने जाने कब मुँह पर टाला जड़ दिया  ये बात अब मैं समझ नहीं पाता हूँ !