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मैं हूँ, वो थी।

वो माँगती रही, मैं देता रहा। वो चुप रही, मैं कहता रहा। वो लौटकर न आने के लिए चली गई, मैं बैठा रहा। उसने मुझसे सब माँगा जो मेरा था, मुझे लगता रहा— रिश्ता जो था हमारा, वो गहरा था। वो चंचल नदी-सी थी, मैं सागर-सा ठहरा हुआ। वो बारिश थी, मैं उसमें भीगता हुआ। वो सुर थी, मैं गीत। वो वीणा थी, मैं उसका संगीत। मैं शाम था, वो खिली हुई-सी धूप। मैं भँवरा था, वो एक फूल। वो बारिश की पहली बूँद थी, मैं ज़मीन की धूल। मैं परिंदा था, वो मेरा आसमान। मैं पहाड़ था, वो गिरता झरना। मैं कलम था, वो मेरी कविता। मैं अक्षर था, वो मेरी कहानी। मैं सूरज था, वो मेरी छाया। मैं चाँद था, वो मेरी चाँदनी। मैं प्यासा था, वो मेरी प्यास। मैं धड़कन था, वो मेरी साँस। मैं बीता हुआ कल था, वो मेरी आस। मैं सर्द रात था, वो मेरी गर्माहट। मैं अंधकार था, वो मेरा उजाला। मैं कृष्ण था, वो मेरी राधा। वो पूर्ण थी— और मैं आधा। मैं हूँ, वो थी।

आँसू बस पानी हैं।

आँसू सब कहना जानते हैं, आँसू सब सहना जानते हैं। आँसू बोलकर भी बहते हैं, आँसू चुप रहकर भी कहते हैं। आँसू कहानी हैं, आँसू यादें हैं, आँसू बातें हैं, आँसू मुलाक़ातें हैं। आँसू बचपन हैं, आँसू जवानी हैं, आँसू बुढ़ापा हैं। आँसू के बाद भी आँसू हैं। आँसू दोस्ती के होने की निशानी हैं, आँसू दोस्त के न होने की कहानी हैं। आँसू बिछड़ना हैं, आँसू मिलना हैं। आँसू जन्म हैं, आँसू मृत्यु हैं। आँसू हैं तो बात बाक़ी है, आँसू हैं तो जज़्बात बाक़ी हैं। आँसू जीत जाना हैं, आँसू हार मानना हैं। आँसू शिक्षा हैं, आँसू अज्ञानता हैं। आँसू लड़ाई हैं, आँसू समझाना हैं। आँसू बाँटना हैं, आँसू मिलाना हैं। आँसू रूठ जाना हैं, आँसू ग़ुस्सा हैं। आँसू माँ हैं, आँसू बच्चा हैं, आँसू पिता हैं, आँसू बेटी हैं। आँसू थाली में खाना हैं, आँसू खाली थाली हैं। आँसू आँख हैं। आँसू बह जाएँ तो सुख है, आँसू रुक जाएँ तो दुःख है। आँसू बस पानी हैं।

मर्द

 मर्द को दर्द नहीं होता,  मर्द रोता नहीं है।  मर्द कुछ कहता नहीं है,  मर्द सब कुछ सहता है।  मर्द घर की ढाल है,  मर्द तारीख़ों में बदलता साल है।  मर्द आसमान है,  मर्द ज़मीन है।  मर्द रोटी है,  मर्द घर का राशन है।  मर्द है तो घर में सुशासन है।  मर्द आँख का काजल है,  मर्द है तो माँ का आँचल है।  मर्द बारिश में भीगना है,  मर्द बारिश में छाता है।  मर्द धूप में छाँव है,  मर्द ठंड में चादर है।  मर्द गर्मियों की हवा है।  मर्द जीवन की साँस है,  मर्द जीने की आस है।  मर्द है तो शिक्षा है,  मर्द है तो थाली है  मर्द है तो दीवाली है।  मर्द किस्सा है  मर्द कहानी है  मर्द बचपन है  मर्द बुढ़ापा है  मर्द नोक झोंक है  मर्द लड़ाई है  मर्द मनाना है  मर्द मान जाना है  मर्द गुस्सा है  मर्द प्यार है  मर्द अँधेरा है  मर्द उजाला है  मर्द है तो त्यौहार है  मर्द है तो सबका व्यवहार है।  मर्द है तो इज़्ज़त है,  मर्द है तो ताक़त...

कुछ बातें बोलकर समझ नहीं आतीं !!

कोना सब खा जाता है रोना सब बहा ले जाता है हँसना सब छुपा जाता है कहना सबको नहीं आता है सुन हर कोई नहीं पाता है आँख सब देख नहीं पाती है नज़र से कोई नहीं बच पाता है दिल कब पिघलता है और कब पत्थर हो जाता है ज़ुबान कभी भी लड़खड़ा सकती है दाँत कभी भी तोड़े जा सकते हैं हड्डियाँ जल्दी जुड़ जाती हैं दिल जोड़कर भी जोड़े नहीं जाते हैं मुहब्बत बेवफ़ा ही कहलाती है प्रेम अंधा ही रह जाता है आत्मा छोड़ जाती है और शरीर जल जाता है कोई अपना धोखा दे जाता है और एक सपना सच भी हो जाता है लोग मिलते हैं, पर मिल नहीं पाते हैं लोग अलग होते हैं, पर हो नहीं पाते दिन बदलते हैं, फिर लोग भी बदल जाते हैं किसी को छोड़ना आसान हो जाता है जब वो पलटकर जवाब दे जाता है बातें ख़त्म नहीं होतीं जब दोस्ती गहरी होती है काम बुरा नहीं लगता जब पसंद का होता है कुछ बातें बोलकर समझ नहीं आतीं और कुछ बातें पढ़कर समझ आ जाती हैं

कृष्ण मुझ से जब पूछेंगे !!

कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि क्या कमाया मैं बोलूंगा "मित्रता" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि क्या गवाया मैं बोलूंगा "शत्रुता" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि साथ क्या लाये हो मैं बोलूंगा "कुछ नहीं" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि क्या छोड़ आये हो मैं बोलूंगा "सब कुछ" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि तेरा क्या था मैं बोलूंगा "अहंकार" "क्रोध" "काम" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि मेरा क्या था मैं बोलूंगा "प्रेम" "समर्पण" "त्याग" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि अपना कौन था मैं बोलूंगा "कोई नहीं, काया भी नहीं" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि पराया कौन था मैं बोलूंगा "अपमान" "घृणा" "तिरस्कार" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि किसको पाला मैं बोलूंगा "ईर्ष्या" "क्रोध" "लोभ" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि जीवन अंत कैसा हो मैं बोलूंगा "भय मुक्त" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि कैसे पाओगे मैं बोलूंगा "अपेक्षा के त्याग से" कृष्ण मुझसे जब पूछेंगे कि क्या करना चाह...

आंसू नहीं जानते हैं !!

गालों पर फैलते काजल की कीमत  आंसू नहीं जानते हैं !! लहरों से डरने वाले समंदर नहीं लांघते हैं !! काग़ज़ के शेर अक्सर बारिशों में बाहर नहीं आते हैं  वक़्त पड़ने पर खून के रिश्ते जम जाते हैं  किताबों की पढ़ी बातें बस परीक्षा में लिख कर आते हैं  और असल ज़िन्दगी में जीने के फ़लसफ़े बदल जाते हैं  कोशिश करने से हार बुरी नहीं लगती  जो जीत जाते हैं वो ये बात समझाते हैं  जिनको आँखें मूँद कर देख लिए करते थे  अब वो आँख खोल कर भी नज़र नहीं आते हैं  बात तेरे मेरे की कभी थी ही नहीं  बस कुछ लोग बिना बोले लकीर खींच जाते हैं  उड़ तो लूँ पर आसमाँ छोटा पड़ने लगा है  बादलों में घर बनाया था   पर हवाओं ने सब इधर उधर कर दीया है  कोई चुटकी काट कर बता दो यारों  दिल पर किसने कब्ज़ा कर लिया है  छीन कर लाये थे उनको गैरों से  अब गैरों ने ही हमें चलता कर दीया है  कोई रोक लो पानी को, ज़मीन प्यासी है  सूरज ने भी बादलों पर पहरा कर दीया है  अरे आते जाते लोग ताना मारने लगे थे  हमने भी किसी किसी के लिए खुद को बहरा कर दीया है...

कांधा झुका नहीं है मेरा!

कांधा झुका नहीं है मेरा, बस वो दोस्त, अब दोस्त नहीं रहा मेरा।  कोशिश हजार की मनाने की, पर उसने थान रखी थी चले जाने की।  अच्छा हुआ उसने मुड़ कर नहीं देखा मैं आंसुओं को रोक नहीं पाता।   चल कर इतनी दूर आए थे भला ये भी कोई उम्र हुई छोड़ जाने की।   दरवाजा मैंने निकाल रख छोड़ा है, अब जरूरत नहीं पड़ेगी खटखटाने की।  खंजर अब नहीं बचे हैं घर में मेरे, तुम्हें जरूरत नहीं है घबराने के।  आईना भी तोड़ रखा है, क्या ही पड़ी है अब इतराने की।  आहिस्ता बोल कर समझाना बेमानी था, क्या ज़रूरत थी चीख कर निकल जाने की।  पड़ोसी अब अक्सर पूछ लेते हैं कि क्यों आवाजें कम आती है हमारे घर से।   मैं मुस्कुराता हूँ ये बोलकर, ज़रूरत नहीं पड़ती अब खुद को मनाने की 🙂

उधार लिया था

 कुछ उधार लिया था एक अनजान से,  अब वही ख्याल रखता है मेरा जान से ! रिश्तों की समझ आते आते बहुत वक़्त गुज़र जाता है,  अपनों का परायापन और परायों का अपनापन समझ से बहार हो जाता है ! दिल भरा भरा और जेबें अक्सर ख़ाली रहतीं हैं! यादें बहुत आती हैं और आँखें आँसू संभाले रहतीं हैं  पैसे रहते तो भी खर्च नहीं कर पाते हैं  अक्सर बूढ़े माँ बाप बच्चों की राह देखते देखते कहीं चले जाते हैं ! आदत भी ख़राब कर रखी है मैंने उनको मानाने की  उनकी भी आदत रही है बिना बताये चले जाने की  कोशिश की, एक दिन सब बोल दूँ  पर बुरा न लग जाये ये सोच कर तस्वीर के सामने से चला आया ! जाने कब वक़्त थम जाये या साँसे  अब बस मिल कर कह दूंगा सारी बातें !!

सुधा की वसुधा!

सुनो, छोटे  छोटे  मोज़े सिलने है, बाजार से ऊन ला कर दे दो  और सुनो थोड़ी इमली भी ले आना  और सुनो आम का अचार माँ जी से मँगवा दो  क्यूंकि बाजार के अचार में केमिकल मिक्स होता है  और सुनो न, काम वाली रख सकते हैं क्या?  "सुधा चल क्या रहा है"? क्या सुबह सुबह इतना बोल रही हो  कोई आ रहा है घर  कौन?  जो तुम्हारा अपना है  अरे कल ही माँ बाबा को कानपुर छोड़ कर आया हूँ  कौन आ रहा है?  वो तुम्हें पापा कह कर बुलाएगी  मतलब!!  तुम पापा बनने वाले हो  कल डॉ. कविता के पास गई थी  उन्होंने ही बताया  अरे वाह, पर तुमने ये क्यों कहा कि  वो पापा कह कर बुलाएगी  वो... मतलब.... मेरा कहना है कि... लड़का होगा  हाँ!! लड़का ही होगा कोई नाम सोचा है? मैडम लड़का ही होगा  मर्द हूँ मर्द  और मैंने सोचा है कि  राजबीर सिंह राजपूत का बेटा  विक्रम सिंह राजपूत  क्या बकवास है  वसुधा नाम रखूँगी  सुधा की वसुधा  नहीं नहीं लड़की वड़की नहीं  लड़का ही होगा  अरे लड़की हुई तो  तो क्या ...

मैं मुंबई हूँ!

जहाँ रातों को जाग कर दिन में सपने बेचे जाते हैं  जहां कोशिश करने पर मंजिलें मिल जातीं हैं  जब भी गिरने को हो तो एक बांह थाम लेती है  जहां तन्हाई का दामन समंदर थामे रहता है  और वक्त हमेशा आगे बढ़ने की सलाह देता है  जहां रोज उठने का एक मज़ा है  जहां खाली बैठना एक सज़ा है  जहां प्यार की कोई कमी नहीं है जहाँ आसमान ज़्यादा है पर ज़मीं नहीं   जहाँ सुबह की फ़ास्ट "सी एस टी" तक  और शाम की अँधेरी लोकल तक में दोस्त बन जाते हैं वो बंद आँखोँ से सच और खुली आँखोँ से सपने दिखाती है  जहां धक्के खाना, वडा पाओ सी आदत बन जाती है जहां गाय से ज्यादा दूधवाला दूध देता है  जहाँ टैक्सी में बैठते ही मीटर डाउन रहता है   जिसके पास बेस्ट है वो लाल बग्गी में बैठा हो ऐसा बतलाता है  जहाँ राज है जहाँ मनसे है जहाँ हर गली में एक सैनिक मिल जाता है  ये दुखों से भरा सूखों से भरा है  ये दिन में सोता, रातों को जगता शहर कहलाता है  ये मेरा शहर, मुंबई के नाम से जाना जाता है ! मैं मुंबई हूँ!

शिकायत किस से करूँ

हवाओं से क्या शिकायत करूँ, उन्हें तो बस बहना आता है दोस्तों से क्या नाराज़गी, उन्हें तो बस कहना आता है  औरत की भी क्या मज़बूरी है, उसे बस सहना आता है  लड़ते झगड़ते लोगों को देख सोचता हूँ, इन्हें कहाँ रहना आता है  हवा को कभी रुके हुए देखा है ? पहाड़ों को चलते हुए देखा है ? नदियों को कभी उल्टी बहती देखा है ? ज़िन्दगी से शिकायत किसको नहीं है  हर बात का जवाब किसके पास नहीं है  सफ़ेद बाल क्या बुढ़ापे की निशानी है ? सिन्दूर ना लगाने से पति की उम्र कम हो जाती है ? बच्चे दूसरों के अच्छे और अपने बुरे क्यों नज़र आते हैं  माँ बाप ज़िन्दगी भर बच्चों को पाल लेते हैं  तो बच्चे माँ बाप को आश्रम में क्यों छोड़ जाते हैं कहानियां नाना नानी सुनाते हैं और दादा दादी के हमेशा सच्ची वाली बात बताते हैं  जब मन उड़ सकता हैं तो हम उड़ क्यों नहीं पाते हैं सच्चे लोग कहाँ मिलते हैं  झूठों के अम्बार मिल जाते हैं  पत्नियाँ कहना क्यों नहीं मानती  पति भी किसी का बॉस  किसी का नौकर है क्यों नहीं जानती  आठ आने होने पर भी आधा रुपया ही क्यों बनता है    ३२ पैसों मे...

पेट की भूख

पेट की भूख ने जाने कब मुँह पर टाला जड़ दिया  मालूम ही नहीं पड़ा  अब मैं खुद से जीत नहीं पाता हूँ  ये सोच कर खुद से लड़ना छोड़ दिया है  ख्वाहिशें दूर तक जाने की थीं  पर अब चल कर बाजार तक चला जाता हूँ आँखें सूख सी गई हैं  पानी मार कर रोने का एहसास दिला देता हूँ  मुस्कुराने की वजह ही नहीं मिलती  ये सोच कर गाल ऊपर की ओर चढ़ाता हूँ  साथी कब ज़िम्मेदारियाँ बन गए  रोज़ काँधों से पूछता हूँ और  हांथों को समझाता हूँ  कहने को बहुत कुछ होता था  पर अब ज़ुबान निकलती नहीं है  क्यूंकि होंठों को रोज़ सी कर बाहर आता हूँ  शिकायत करने के लिए उँगलियों का उठना ज़रूरी है  पर कल का राशन कहाँ से आएगा ये सोच कर  उँगलियों की मुठ्ठी बना बगलों में दबा जाता हूँ।  पेट की भूख ने जाने कब मुँह पर टाला जड़ दिया  ये बात अब मैं समझ नहीं पाता हूँ !

ख़ामोशी बोलती है

ख़ामोशी बोलती है शोर चुप कराता है आँखें कहतीं हैं ज़ुबान पर ताला लग जाता है कोई होता है  कोई होकर भी नहीं हो पाता है कुछ सपने सच होते हैं  और कभी सच भी सपना रह जाता है कभी बहुत कुछ बोल कर भी नहीं बता पाते  कभी बिना बोले ही पता चल जाता है किसी दुख में भी आँसू नहीं आ पाते  और कहीं खुशियों में गम भर जाता है तुझ को समझूं या खुद को समझाऊं  ये तेरे होने का दर्द है  या तेरे चले जाने की ख़ुशी भला ऐसा भी कोई रूठ जाता है निराशा में भी आशा होती है  प्रेम की भी कोई परिभाषा होती है? तेरे मेरे बीच की दूरी दो कदम भर ही है पर दो कदम भर चलने के लिए   भला क्या कोई सारी जिंदगी लगाता है।

ग़लतफ़हमी

ग़लतफ़हमी में जीने का एक फायदा है,  सब कुछ मिल जाता है वहां, साँसों के अलावा ! दुनिया रोशन किसी और से है, पर चिरागों को ये बात कोन समझाये! कोशिश करते रहे हाथ बढ़ा कर उनको मनाने की  आखिर में उन्होंने हमारे हाथ काट कर दरवाज़ा बंद कर दिया ! 

नोट बंदी

ये उस दिन के बाद की बात है जब रात ८ बजे के बाद भारत देश, लगभग सारा देश सो नहीं पाया था। ५०० और १००० रुपय के नोटों का चलन उस दिन की मध्य रात्रि से बंद होना था।  अगले दिन से सारा देश एक साथ बहार आ कर खड़ा हो गया था। सभी धर्मों के लोग सभी जातीयों  के लोग सभी वर्णो के लोग सब एक साथ एक के पीछे एक शांति से बैंकों की लाइनों में साथ आ गए थे। वहीं किसी एक लाइन में मैं भी खड़ा था और देख पा रहा था की किसी को भी कुछ समझ नहीं आ रहा है, पर सब प्यार से एक दूसरे से हाल चाल पूछ रहें हैं. मुद्दतें हो गई थी जिन दोस्तों से हुई मुलाकात हुए उनमें से कोई ५ जन आगे खड़ा था तो कोई बहुत पीछे, बस मुस्कुराकर हाथ हिला देते थे, खुद भी पसीने में थे और पास रखे कम या ज्यादा सब गाँधी भी पसीने में भीगे दिखलाई पड़ रहे थे, वो किस्से कहानियाँ, वो कॉलेज की यादें, वो स्कूल की शरारतें, फिर बतलाई, दोहराई जा रही थीं। किसी को वक़्त का इंतज़ार नहीं था, किसी को कोई फ़िक्र नहीं थी की कहीं जाना है, लेट हो रहे हैं, मेरे साथ कुछ और लोग भी थर्मस में चाय कॉफ़ी, पार्ले जी बिस्कुट ले आया करते थे, कोई किसी की शर्म नहीं कर रहा था, बस थैले ...

महबूब स्टूडियो

रात बड़ी तकलीफ देह गुज़री, कई करवटों के बदलने के बाद भी नींद का नामों निशान नहीं था। गोया हुआ यूँ की हमने कोई गलती तो की नहीं थी कि हमें किसी चीज़ की घबराहट रही हो और ये बात भी आपसे पहले ही बता रहे हैं ताकि आप भी कोई ग़लत मतलब ना निकल लें और एक साफ़ सुथरी घटना के मूक दर्शक बने रह सकें। तो साहब हुआ यूँ की शाम ८ बजते बजते हम अपने पायजामे और बनियान में जा बसे थे, और एकांत में खिड़की के सहारे बाहरी दुनिया को भरे पेट गालियाँ दे ही रहे थे की  तीन वड़ा पाव एक समोसा एक थम्ज़-उप ने उत्पात मचाना चालू कर दिया था। हम एक तरफ हो घरवालों से नज़रें चुरा कर ज़ोरदार आवाज़ के साथ हलके हो ही रहे थे की अचानक हमारा मोबाइल ढिंका-चिका, ढिंका-चिका की चीखो पुकार करने लगा। हमने भी माहौल को गरम करते हुए हु हा की हुंकार भरी और गला साफ़ करने वाली आवाज़ का सहारे लेते हुए फ़ोन उठा लिया और सामने वाले की कर्कश आवाज़ को कोयल सी मधुर जान कर, खुद को सम्मान देते हुए हमने कहा "गमछा स्पीकिंग" और सामने से वही कर्कश सी आवाज़ जैसे अमरीश पूरी जी का भी गला बैठ गया हो  "अरे मुन्ना बिसेस्वर बोल रहें हैं महबूब स्टूडियो से और फिर ...

तू चल मैं आता हूँ

तू चल मैं आता हूँ ये तेरा वहम है या अहम बतलाता है आसमान क्या देखता है  चलने के लिए मिली ज़मीन को झुठलाता है  सपनों की उड़ान के लिए  हक़ीक़त को भूल जाता है  चलने वाले दूसरे के भरोसे नहीं रहते  जो साथ चलना जानते हैं  वो चलने को नहीं कहते  चल देते हैं  मुहब्बत की नुमाइश आँखों से रोज़ करने वाले  प्यार करने की नज़र खो देते हैं  फरेब की मिट्टी में झूठ बोल कर सच्चाई को दबाया जाता है  पर वक़्त की आंधी में एक दिन सच कमल बन कर सामने आ ही जाता है तू चल, मैं आता हूँ मैं कब का निकल चला हूँ  तुझे हूँ बस यही दिखलाता हूँ

फ़िल्मी कीड़ा!

रात बड़ी तकलीफ देह गुज़री, कई करवटों के बदलने के बाद भी नींद का नामो निशाँ नहीं था. अब गोया यूँ की हमने कोई गलती तो की नहीं थी की हमें किसी चीज़ की घबराहट हो. चलो  ये  बात भी आपसे शेयर कर किये देता हूँ, ताकि आप कोई शक या गलत फहमी न रखें और एक साफ़ सुथरी सत्य घटना का आनंद ले सकें। तो साहब हुआ यूँ की शाम 7 बजते - बजते हम अपने पायजामे और बनियान में जा बसे थे और एकांत में खिड़की के सहारे खड़े होकर बाहरी  दुनिया को गालियाँ दे ही रहे थे की इस बीच जब हम एक तरफ हो कर दुनिया से नज़रें चुरा कर एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ हलके हो रहे थे तभी अचानक से हमारा मोबाइल फ़ोन, ढिंका चिका ढिंका चिका की चीखो पुकार करने लग गया। हमने भी माहौल  को गरम करते हुए हु हा हु हा की और गला साफ़ करने वाली आवाज़ का सहारे लेते हुए "हॉलो" का उच्चारण किया और फिर जैसे समय रुक गया।  अरे भैया मेहबूब स्टूडियो से फ़ोन था। हाँ- हाँ आपकी भी आँखें बड़ी बड़ी खुल गई ना......  तो क्या आसान बात थोरे ही न है की मेहबूब स्टूडियो से किसी को फ़ोन आना। बहरहाल अपने ही गंध से हमारी चेतना टूटी और हम भाग कर हवादार रोशनदान के पास पहुंच ...

यादों का पिटारा

आज दिल को क्या टटोला, यादों का पिटारा खुल गया, जो छुपा रखा था जले हुए कागज का किनारा मिल गया, कुछ अल्फ़ाज़ मिले कुछ बातें, कुछ सूनी, कुछ जागी रातें, कुछ जागती आंखों के सपने मिले,  कुछ जो पराए हुए वो अपने मिले, कुछ मिले जो खुशियाँ ले गए, और कुछ मिले जो आँसू दे गए, फिर थोड़ा और गहरा खोजा तो बचपन मिला, जो मां के आंचल में छुपा था, अटखेलियाँ करता, गिरता पडता, माँ के आँचल में जा छुपा था, फिर थोड़ी सी जवानी मिली, बाबूजी की सीखों के साथ कानो को खींचती हुई कहानी मिली, वो दर्द भी, दांत भी, मुस्कराहट दे गई, फिर बड़े भाई का वो कमीज मिला जो मैंने स्याह कर रख छोड़ा था, और बहन का चीख कर मां को बुलाना मिला,  फिर रोते हुए उसके चेहरे पर हसाना मिला,  थोड़ा ही सही खुशियों का खजाना मिला, और फिर तुम मिली, एक सुनहरी धूप का एक पल जो था वो सब ओर बिखर गया, और बिखर गई वो जुल्फ, जो कभी भी काली घटा बन जिंदगी में चली आती थी, तुम मिलती है तो मुस्कुराहट बिखरती थी,  और न मिलती तो आँखें धुंधली हो जाती थी, और यादों का पिटारा भर गया,  मैं मैं से हम हुए,  और वक्त मेरा घर हमारा कर गया, आज दिल को ...

कोई नई बात नहीं ... पुरानी है!

एक छोटी सी दीया बाती भी एक बड़े कमरे को उजाले से भर देती है,  खुशी कितनी भी हो, हमेशा ही कम पड़ती है,  ज्यादा हँसी भी आँसू ले आती है,  ग़म कितना भी छोटा हो सारी दुनिया भुला देता है,    छोटी छोटी सी यादों में गहरे गहरे ज़ख्म छुपे होते हैं, कई फैसले, वक़्त और कलम के बीच रुके होते हैं, ये भी कोई नई बात नहीं पुरानी है,   हम पर जो बीत रही है,  वो तुम्हारे लिए बस एक गुज़री हुई कहानी है.